नई दिल्ली: 22 जुलाई 2025 को दिल्ली के संसद भवन के पास स्थित एक मस्जिद में समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा अपने सांसदों के साथ कथित तौर पर की गई बैठक ने भारतीय राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है. इस घटना ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और सपा के बीच तीखी तकरार को जन्म दिया, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए. बीजेपी ने अखिलेश को "नमाजवादी" करार देते हुए इस कृत्य को असंवैधानिक बताया, जबकि अखिलेश ने बीजेपी पर समाज को बांटने का आरोप लगाया है.
कैसे शुरू हुआ विवाद?
मंगलवार, 22 जुलाई 2025 को लोकसभा के मानसून सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद अखिलेश यादव अपने कुछ सांसदों के साथ संसद परिसर के निकट एक मस्जिद में गए. इस मस्जिद के इमाम, रामपुर से सपा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी, ने अखिलेश को मस्जिद के बारे में बताया, जो संसद भवन से सड़क के उस पार स्थित थी. अखिलेश और उनके सहयोगी वहां पहुंचे और कुछ समय के लिए वहां रुके. इस दौरान, सपा सांसदों के साथ उनकी यह मुलाकात एक कथित "बैठक" के रूप में चर्चा का विषय बन गई. सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने इस घटना की तस्वीरें अपने X अकाउंट पर साझा कीं, जिसके बाद विवाद ने तूल पकड़ा.
बीजेपी ने किया तंज
बीजेपी ने इस घटना को तुरंत भुनाने की कोशिश की. उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने अखिलेश पर निशाना साधते हुए कहा कि संविधान में स्पष्ट लिखा है कि धार्मिक स्थलों का उपयोग राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाएगा. फिर भी, सपा और इसके प्रमुख अखिलेश यादव बार-बार संविधान का उल्लंघन करते हैं. वे ''नमाजवादी पार्टी'' की तरह व्यवहार करते हैं. बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी ने इस मुद्दे को और आगे बढ़ाते हुए मांग की कि मोहिबुल्लाह नदवी को मस्जिद के इमाम पद से हटा दिया जाए. उन्होंने कहा कि अखिलेश ने मस्जिद को सपा का दफ्तर बना दिया है. यह इस्लाम के खिलाफ है. बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा ने ऐलान किया कि 25 जुलाई को जुमे की नमाज के बाद उसी मस्जिद में इस कथित बैठक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जाएगा.
उत्तराखंड वक्फ बोर्ड का बयान
इस विवाद में उत्तराखंड वक्फ बोर्ड ने भी अपनी आवाज बुलंद की. बोर्ड के अध्यक्ष ने कहा कि हम गैर-मुस्लिमों के मस्जिद में प्रवेश के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन मस्जिद का राजनीतिक मकसद के लिए उपयोग करना इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है. अखिलेश यादव और उनके सांसदों ने इस पवित्र स्थान का दुरुपयोग किया है. बोर्ड ने इस घटना की निंदा करते हुए इसे धार्मिक स्थल की गरिमा के खिलाफ बताया.
अखिलेश यादव का पलटवार
अखिलेश यादव ने बीजेपी के आरोपों का जवाब देते हुए कहा, "आस्था जोड़ती है, और हम हर धर्म में आस्था रखते हैं. बीजेपी का हथियार ही धर्म है. वे चाहते हैं कि लोग एकजुट न हों, बल्कि बंटे रहें." उन्होंने मीडिया पर भी निशाना साधते हुए कहा, "आप लोग भी बीजेपी के चक्कर में फंस गए हैं. आस्था जोड़ने का काम करती है, और हम उसका सम्मान करते हैं." सपा सांसद राजीव राय ने भी इस विवाद में अपनी बात रखते हुए कहा, "क्या अब हमें मंदिर-मस्जिद जाने के लिए बीजेपी से लाइसेंस लेना होगा?"
बता दें कि यह विवाद उस समय सामने आया है, जब सपा और बीजेपी उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटे हैं. बीजेपी लंबे समय से अखिलेश और सपा पर "मुस्लिम तुष्टिकरण" का आरोप लगाती रही है. दूसरी ओर, अखिलेश अपनी पार्टी को सभी धर्मों और समुदायों के लिए समावेशी दिखाने की कोशिश में हैं. हाल ही में, इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण में उनकी सक्रियता को बीजेपी के "हिंदू-विरोधी" आरोपों का जवाब देने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.