OP Rajbhar Muslim Politics: यूपी चुनाव में अभी करीब 10 महीने का वक्त है, जिसके लिए अखिलेश ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है तो वहीं योगी लगातार तीसरी बार हैट्रिक मारने की तैयारी में हैं, पर इसी बीच एनडीए में ऐसी खींचतान की ख़बर आई है, जिसने बीजेपी के भी होश उड़ा दिए हैं...ओपी राजभर का दावा है कि वो इस बार अपनी पारंपरिक गाजीपुर की जहूराबाद को छोड़कर सपा के गढ़ आजमगढ़ की अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र से चुनावी मैदान में होंगे. 62 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी में हैं, और ये सब हवा-हवाई नहीं है, बल्कि इसके पीछे पूरी तैयारी है.
राजभर के दावों को हकीकत में बदलती कुछ तस्वीरें भी नजर आती है, जिसमें वो अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र में कई कार्यक्रमों में शामिल होते दिख रहे हैं, बीते करीब एक हफ्ते में उनके दौरे ने नई हलचल पैदा कर दी है. जिसके बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर राजभर की इस प्लानिंग का राज क्या है, क्या वो जहूराबाद सीट पर संभावित हार के डर से सीट बदलना चाह रहे हैं, क्योंकि राजनीति के जानकार कहते हैं कि वहां अंसारी परिवार का कभी दबदबा रहा, और उसकी मदद से भी राजभर को चुनाव में जीत मिली, लेकिन अब अब्बास अंसारी का परिवार एक तरह से सपा के नजदीक है.
अब्बास खुद इनकी पार्टी से विधायक हैं, पर अब्बास के जेल से छूटने के बाद जो कहानी सामने आई उसने राजभर के सामने नया धर्मसंकट पैदा कर दिया है, क्योंकि या तो वो माफिया मुख्तार के बेटे अब्बास का साथ देते या फिर योगी के बगल में कुर्सी पर बैठते हैं, क्योंकि योगी आदित्यनाथ की पॉलिसी माफियाओं को लेकर काफी सख्त रही है. ऐसे में चर्चा ये शुरू हुई कि अंसारी परिवार की गाजीपुर में जो पकड़ है.
उसकी वजह से राजभर इस बार सीट बदलने की तैयारी में हैं, हालांकि वो इन चर्चाओं को सिरे से खारिज करते हैं, बल्कि वो दावा करते हैं कि हमने 62 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर ली है, जिसमें से कई सीटें निषाद पार्टी की गढ़ वाली हैं, और कुछ सीटें सपा की गढ़ वाली हैं. अब सपा वाली सीटें जीतकर अगर राजभर देते हैं तब तो एनडीए को फायदा होगा, लेकिन एनडीए की सहयोगी निषाद पार्टी की सीटों पर अगर नजरें गड़ाते हैं तो गठबंधन धर्म का सवाल खड़ा हो जाएगा, इसीलिए संजय निषाद ने राजभर के बयान पर आपत्ति जताई है, उनका कहना है बैठक में इसका फैसला होना चाहिए...
ऐसे में सवाल ये भी उठ रहा है कि ओपी राजभर आखिर ऐसे ऐलान क्यों कर रहे हैं, जो गठबंधन की मुश्किलें बढ़ा सकता है, राजभर का राजनीतिक इतिहास देखें तो एक वक्त में उनका सपा से भी गठबंधन रहा, फिर वो बीजेपी के साथ आ गए, राजभर वोट पर उनकी पकड़ अच्छी है. लेकिन अतरौलिया सीट पर राजभर जाति की आबादी कम है, तो फिर इनके वहां जाने और जीत की संभावना दिखने की वजह क्या हो सकती है, वो कहते हैं कि दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं ने यह मान लिया है कि उनका असली हित कहां है, अल्पसंख्यकों के लिए भी हमारी सरकार ने काम किया है, इसलिए उनका रुझान हमारी तरफ है.
यानि विकास कार्यों की बदौलत वो सियासी समीकरण बदलना चाहते हैं, पर साल 2012 में जब राजभर ने 52 सीटों पर चुनाव लड़ा था तो कितनी बुरी हाल मिली थी, शायद वो भूले नहीं होंगे. उसके बाद 2017 में थोड़ा कमाल दिखाया, और 2022 में सपा से गठबंधन कर इन्होंने 17 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन 6 पर ही जीत मिली, और उसके बाद 5 साल पुराने होने से पहले ही गठबंधन तोड़कर बीजेपी के साथ आ गए और अब पूर्वांचल ही नहीं बल्कि यूपी की बाकी सीटों पर भी अपनी पार्टी को मजबूत करने का प्लान बना रहे हैं, पर एक वोटर के तौर पर आपको क्या लगता है, राजभर की रणनीति काम आएगी या इनकी जिद एनडीए को ही नुकसान पहुंचा सकती है.