सड़क पर कटने वाले चालान से लेकर ऑफिस में बनने वाले ड्राइविंग लाइसेंसे तक में रिश्वत कहां-कहां चल रहा है...कभी गाड़ियों की फिटनेस, तो कभी पॉल्यूशन और पीली पट्टी देखते ही टैक्सी ड्राइवर को कहां-कहां परेशान किया जा रहा है, ये किसी से छिपा नहीं है...ना ही ये बात किसी से छिपी है कि एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी, जिसने ईमान को खूंटी पर टांग दिया है वो महीने में अपनी सैलरी छूता तक नहीं, तभी तो एक ARTO के घर से 35 करोड़ का खेल पकड़ा जाता है...कई जिलों के अधिकारी रडार पर आते हैं, 32 भ्रष्ट अधिकारियों की लिस्ट तैयार होती है, और छापेमारी का नया प्लान शुरू हो जाता है...अब वो अधिकारी कहां-कहां के हो सकते हैं, इस पर आएं उससे पहले ललित कुमार की पूरी कुंडली सुन लीजिए...
ललित कुमार ने कैसे किया खेल ?
एक RI यानि रीजनल इंस्पेक्टर के पद से ARTO के पद तक पहुंचने वाला ललित कुमार की कमाई देखकर हर कोई हैरान है….कानपुर से शुरू हुई काली कमाई का स्रमाज्य आगरा तक पहुंचा. फिर आगरा में इस लुटेरे ने ऐसी काली कमाई का तरीका निकाला कि 13 किलो सोना सिर्फ घर से मिला….हैरानी की बात ये है कि ये RTO नहीं था. ये ARTO था. सोचिए अगर ये RTO होता होता तो क्या होता….तब खेल शायद 35 करोड़ का नहीं बल्कि सैकड़ों करोड़ का खुलता...पर कहते हैं रिश्वत की दीवार चाहे कितनी भी ऊंची क्यों न हो, एक चींटी जैसी शिकायत भी उसे धराशायी कर देती है...यही हाल ललित कुमार के साथ हुआ..जिसके खिलाफ
साल 2020 में एक व्यक्ति ने तात्कालीन परिवहन आयुक्त से ये शिकायत दी कि RI ललित कुमार ने ड्राइविंग लाइसेंस के लिए मुझसे 300 रुपये रिश्वत की मांग की है.
शिकायत मिलते ही सितंबर 2020 में ललित कुमार के खिलाफ एंटी करप्शन टीम को जांच की अनुमति दे दी जाती है...और करीब 4 साल तक एंटी करप्शन की टीम सबूत जुटाती है, आय से अधिक संपत्ति का केस दर्ज करने के लिए दस्तावेज खंगालती है, तब जाकर 2025 में कानपुर के एंटी करप्शन थाने में ललित कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता है, लेकिन ललित कुमार को थोड़ी भी घबराहट नहीं होती, बल्कि वो वहां ये दलील देता है कि मैं राजपत्रित अधिकारी यानि गैजेटेड ऑफिसर हो चुका हैं, इसलिए मेरे खिलाफ जांच करने का अधिकार एंटी करप्शन को है ही नहीं, नतीजा मामला विजिलेंस विभाग के पास ट्रांसफर कर दिया जाता है...और फिर विजिलेंस की टीम जब घर में छापा मारने पहुंचती है तो
सोने-चांदी के बिस्किट, लखनऊ, नोएडा, बाराबंकी, सीतापुर और रायबरेली में खरीदे गए जमीन के दस्तावेज और करीब डेढ़ करोड़ से ज्यादा नकदी बरामद होती है.
उसके बाद ये भी खुलासा होता है कि ललित कुमार ने जहां-जहां नौकरी की, वहां पूरा अपना जाल बिछा रखा था, ताकि कोई भी जांच एजेंसी आसानी से न पकड़ सके...इसके रसूख का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि साल 2020 में जब आगरा में ट्रांसफर हुआ तो लंबे वक्त तक ड्यूटी नहीं की, ज्यादातर दिन छुट्टियों में बिताए, ताकि कोई पूछताछ करने न आ जाए, जांच तेज न हो जाए. एआरटीओ प्रवर्तन द्वितीय की जो कुर्सी ललित कुमार को मिली थी, वो ऐसे खाली मिलती थी, मानो इस पद पर किसी को बहाल ही नहीं किया गया हो, पर सारी चालें फेल हो गईं. योगीराज में शिकंजा कसना शुरू हुआ तो फिर बचने को कोई रास्ते काम नहीं आए...
भ्रष्ट अधिकारियों की तुरंत करें शिकायत
आज देखिए कि जिस अधिकारी के सामने कोई कानून नहीं था. उसकी बर्बादी की कहानी 300 रूपए ने कैसे लिख डाली…भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बुलडोज़र वाला एक्शन जारी है, जो संपत्तियां जमीर बेचकर बनाई, लोगों को परेशान करके बनाई, अब वो सरकार की होने वाली हैं, क्योंकि आय से अधिक संपत्ति के मामले में जब ये बात साबित हो जाती है तो फिर आरोपी का उस पर कोई अधिकार नहीं रह जाता...इसलिए आपके आसपास भी अगर कोई भ्रष्टाचार का ऐसा मकड़जाल फैला रहा है, तो उसकी शिकायत तुरंत करें, कमेंट बॉक्स में भी बताएं, ताकि सड़क पर बेवजह वसूली करने वालों पर एक्शन हो सके...चूंकि ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग की ड्यूटी अपने विभाग में सबकुछ ठीक रखने की है, सड़कों की ट्रैफिक से लेकर लाइसेंस तक को देखना है, इसलिए ईमानदारी से कोई ड्यूटी निभाए तो उसे निशाना नहीं बनाए, बल्कि बेईमान और भ्रष्ट कर्मचारियों और अधिकारियों की पोल खोलें...