गांव में अक्सर आपने लोगों को कहते सुना होगा, बिटिया 10-12वीं तक पढ़ गई तो अब उसकी शादी कर दो, कॉलेज बहुत दूर है, कैसे पढ़ने जाएगी, कई लड़कियां मन मसोसकर पढ़ाई छोड़ देती हैं, जिसकी समस्या जब योगी के कानों तक पहुंची, तो उन्होंने कुछ महीने पहले एक योजना का ऐलान किया, जिसका नाम था रानी लक्ष्मीबाई स्कूटी योजना...
इसके तहत दूर-दराज की मेधावी छात्राओं को स्कूटी देने के लिए सरकार ने 400 करोड़ का बजट देने का ऐलान किया...लेकिन इस योजना पर अब यूपी की राज्यपाल ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं, वो कहती हैं मैंने अपर मुख्य सचिव को फोन कर पूछा कि जो नियम आपने बनाया है, उसके तहत तो 90 फीसदी अंक लाने वाली छात्राओं को स्कूटी मिलेगी, और गांव की लड़कियां जिनके पास पहले से सुविधाओं का अभाव है, वो कहां इतना नंबर ला पाएंगी, ऐसे में इस योजना का क्या फायदा..
IAS पार्थ सारथी सेन कौन ?
अब सवाल तो बिल्कुल वाजिब है, फिर ऐसा नियम बनाने वाले साहब कौन हैं, अगर शिक्षा विभाग की बात करें तो अपर मुख्य सचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, 1992 बैच के सीनियर IAS ऑफिसर पार्थ सारथी सेन, जो अखिलेश सरकार में सचिव पद पर रहे, उसके बाद दिल्ली में प्रतिनियुक्ति पर गए, कई अहम जिम्मेदारियां संभाली और 2022 में जब उनके यूपी लौटने की ख़बर आई तो उनके नए पोस्टिंग की चर्चा खूब हुई, पर शिक्षा विभाग में इनकी नियुक्ति को अभी एक साल भी पूरे नहीं हुए हैं, ये अक्सर बच्चों को तनाव से दूर रहने, पढ़ाई के साथ-साथ अपने लिए वक्त निकालने जैसी सलाह देते रहते हैं.. फिर ऐसी नियमावली इनके विभाग ने क्यों बनाई, इसके पीछे का तर्क अगर देखें तो ये हो सकता है कि
पर्सेंटेज अगर कम रखा जाएगा तो लाभार्थी ज्यादा हो जाएंगे. अभी एक स्कूटी की कीमत करीब 1 लाख रुपये पहुंच चुकी है. इस हिसाब से 400 करोड़ के बजट में 40000 स्कूटी मिल पाएगी. यानि अधिकारियों ने दिमाग लगाकर ये नियम बनाया है. लेकिन इससे तो उन्हें लाभ मिलेगा ही नहीं, जिनके लिए ये योजना बनी है...
राज्यपाल का सवाल भी यही है, जिनकी बातों को मीडिया ने प्रमुखता से दिखाया, लेकिन अब असली सवाल यह है कि उनकी बात कितनी सही है, जब ये योजना गरीब और जरूरतमंद बेटियों के लिए बनाई गई है, तो फिर 90 प्रतिशत अंक की पात्रता क्यों तय की गई? ग्रामीण इलाकों, सरकारी स्कूलों और संसाधनों की कमी के बीच पढ़ने वाली बच्चियों के लिए 90 प्रतिशत अंक हासिल करना आसान नहीं होता...क्या शिक्षा विभाग ने ऐसी नियमावली जानबूझकर बनाई है, जिससे योजना का लाभ सीमित वर्ग तक ही सिमट जाए?
400 करोड़ रुपये की योजना का उद्देश्य गरीब बेटियों की मदद करना है या सिर्फ कागजों पर बड़ी उपलब्धि दिखाना? अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन को बताना चाहिए कि गरीब और ग्रामीण छात्राओं को योजना से बाहर करने वाली यह शर्त किस आधार पर तय की गई. अधिकारियों ने ये क्यों नहीं सोचा कि यहां पर्सेंटेज की बजाय घर से कॉलेज की दूरी या आर्थिक पैमाना वाला नियम तय करें, ताकि योजना का उद्देश्य पूरा हो सके...आनंदीबेन पटेल का ये कोई पहला बयान नहीं है, बल्कि इससे पहले उन्होंने कॉलेज में एक्स्ट्रा निर्माण, आंगनबाड़ी केन्द्र में कमियां और हॉस्टल में लड़कियों को होने वाली दिक्कतों पर भी सवाल उठाए हैं, और इन दिनों उनके इस बयान की चर्चा भी खूब हो रही है, जिसमें उन्होंने लड़कियों के घर से भागने पर कुछ ऐसी बात कही कि सवाल उठने लगे...