bharat Tiwari Encounter Case : जब एक नक्सली सरेंडर करे तो उसे सम्मानपूर्वक मुख्यधारा से जोड़ लिया जाता है. जब कसाब सरेंडर करता है तो उसे जिंदा रखकर बिरयानी खिलाई जाती है, तो फिर अपने ही देश का भरत तिवारी अगर सरेंडर कर रहा था तो पुलिस ने क्यों नहीं करने दिया. वो चार पुलिस ऑफिसर कौन है, जो चाहते तो भरत तिवारी की जान बच सकती थी.
पहले नंबर पर हैं, शाहपुर थाना SHO राजेश मालाकार. इनकी जिम्मेदारी अपने इलाके में शांति व्यवस्था बनाए रखने की थी, यही भरत तिवारी को पकड़ने भी गए थे, तब भरत तिवारी ने इन्हें कहा था ठोंक दूंगा, लेकिन बतौर थानाध्यक्ष ये हालात को ठीक से नहीं समझ पाए, ना ही उन्होंने इस मामले में सीनियर अधिकारियों से साइकोलॉजिकल काउंसलिंग जैसी कोई मदद मांगी. बल्कि, अगले दिन STF बुलाकर ऐसा माहौल पैदा किया, जैसे सामने वाला व्यक्ति बड़ा अपराधी हो.
दूसरे नंबर पर हैं, भोजपुर के एसपी राज. ये उस जिले के कप्तान हैं,जहां घटना हुई, किसी भी ऑपरेशन की फाइनल मंजूरी इन्हें ही देनी होती है. इनके ऑफिस ने प्रेस रिलीज जारी कर ये कहा युवक मानसिक रूप से विक्षिप्त है, उसे अस्पताल भेजने की प्रक्रिया चल रही है. जबकि दूसरे दिन इन्होंने डॉक्टर की बजाय एसटीएफ की टीम भेज दी. तीसरे नंबर पर हैं SDPO राजेश कुमार शर्मा. बुधवार सुबह जब भरत तिवारी के खिलाफ ऑपरेशन चल रहा था, तो उसे यही लीड कर रहे थे. जिसका मतलब है इन्हें कई तरह के प्रोटोकॉल का पालन करना चाहिए था, जो इस मामले में नहीं हुआ. इनकी कोशिश उसे जीवित पकड़ने की होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, इसलिए इन पर भी सवाल उठ रहे हैं. चौथे नंबर पर सोशल मीडिया सेल.
शाहपुर थाने और जिले की वो सोशल मीडिया सेल इतने दिन से कहां थी, जब भरत तिवारी ने खुद को क्रांतिकारी बताकर सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट करना शुरू किया. क्या जिन लोगों को इसकी जिम्मेदारी मिली थी, उन्होंने कानूनी एक्शन लेने की बजाय लापरवाही क्यों बरती. अगर भरत तिवारी की मांगें सुनी जाती तो ऐसी नौबत क्यों आती, आज ये दावा किया जा रहा है कि भरत के फोन में कुछ ऐसे सबूत थे, जिससे बड़े खुलासे हो सकते थे, लेकिन वो फोन भी अब जब्त है, तो क्या उसमें कोई डेटा बचा है. बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं, सम्राट सरकार से सवाल पूछ रहे हैं, पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या पुलिस को जो ट्रेनिंग मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों को पकड़ने के लिए दी जाती है, उसमें वो फेल हो गई है...क्या सम्राट चौधरी जिस मॉडल को खड़ा करना चाहते हैं, वो शुरू होते ही फेल हो गया है.
आज जिस इलाके में ये घटना हुई है, उसका स्वतंत्रता संग्राम से बड़ा इतिहास है. इसी जिले के जगदीशपुर में बाबु वीर कुंवर सिंह जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी पैदा हुए, लेकिन आज उनके गांव से करीब 20 किलोमीटर दूर बसा बिलौटी गांव चर्चा में है. सोशल मीडिया पर कोई भरत तिवारी को समाजसेवक तो कोई भगत सिंह कह रहा है, पप्पू यादव से लेकर अश्विनी चौबे तक आज उनके परिवार को आश्वासन दे रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ भरत तिवारी के पिता और भाई पर सरकारी कार्य में बाधा डालने समेत कई गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ है, तो क्या पुलिस अपनी गलती छिपाने के लिए मुकदमों की फेहरिस्त बढ़ाती जा रही है. आखिर जब कोई समाज की मांग उठाता है तो उस वक्त सत्ता, सिस्टम और नेता कहां सो रहे होते हैं. सोचिए और जवाब दीजिए.