69000 शिक्षक भर्ती मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने शिक्षक भर्ती की मेरिट लिस्ट को रद्द कर दिया है और सरकार को परीक्षा का परिणाम नए सिरे से जारी करने का आदेश दिया है. इस आदेश से यूपी सरकार को बड़ा झटका लगा, हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ डबल बेंच ने इस भर्ती की मेरिट लिस्ट को रद्द करने का जो आदेश सुनाया उसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट जा सकती है.
सपा, कांग्रेस और बसपा समेत तमाम विरोधी दलों ने हाईकोर्ट कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया और योगी सरकार को घेर लिया. मुद्दे पर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से लेकर एनडीए में सहयोगी अपना दल की अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल भी सुर से सुर मिलती नजर आ रही है. इसे देखते हुए ऐसा लग रहा है मानों सीएम योगी इस मुद्दे पर अकेले पड़ गए हैं. क्योंकि केशव प्रसाद मौर्य और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत किया है. साथ ही दोनों ही नेताओं ने पिछड़ा-दलित वर्ग के पात्रों की जीत होने की बात कही है.
अब ये जनना जरूरी हो जाता है कि आखिर ये मामला शुरू कहा से हुआ. साल 2012 में जब उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार थी, तब 1 लाख 37 हजार शिक्षामित्रों को सहायक शिक्षक के रूप में बदल दिया गया था. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और समायोजन को रद्द कर दिया गया. यानी अखिलेश सरकार ने जिन शिक्षामित्रों को सहायक शिक्षक बनाया था वो फिर से शिक्षामित्र बन गए.
अब इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 1 लाख 37 हजार पदों पर भर्ती का आदेश योगी सरकार को दिया था, जिसपर योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि हम एक साथ इतने पदों पर भर्ती नहीं कर सकते हैं, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दो चरण में सभी पदों को भरने का आदेश दिया था. इस आदेश के बाद योगी सरकार ने 2018 में पहले चरण में 68500 पदों के लिए वैकेंसी निकाली थी. इसके बाद दूसरे चरण में 69000 सहायक शिक्षकों की भर्ती निकाली थी.
लेकिन अब इन्ही भर्तियों को लेकर अभिलेश यादव योगी सरकार पर हमलावर है. बीते दिन अखिलेश यादव बिना नाम लिए डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य पर तंज भी कसा. अखिलेश ने कहा बीजेपी को हम लोग यूपी से बाहर कर देगें. वह डिप्टी सीएम है कौन, बीजेपी की नियत तो लोगों के बीच बंटवारे की रही है. दर्द देने वाले, दवा देने का दावा न करें. उत्तर प्रदेश के एक ‘कृपा-प्राप्त उप मुख्यमंत्री’ का बयान भी साजिशाना है.
69 हजार सहायक शिक्षक पदों के लिए निकली इस भर्ती की परीक्षा 6 जनवरी 2019 को हुई. इस भर्ती के लिए अनारक्षित की कटऑफ 67.11 फीसदी और ओबीसी की कटऑफ 66.73 फीसदी रही. इस भर्ती के जरिए करीब 68 हजार लोगों को नौकरी मिली, लेकिन यहीं से यह सवाल उठा कि 69 हजार भर्ती में आरक्षण नियमों को लेकर अनदेखी की गई. बेसिक शिक्षा नियमावली 1981 का पालन सही से नहीं किया गया. इसके बाद 69000 भर्ती के अभ्यर्थी आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर गए.
अभियार्थियों का कहना था कि अगर कोई OBC वर्ग का अभ्यार्थी अनारक्षित श्रेणी के कटऑफ से ज्यादा नंबर लाता है तो उसे OBC कोटे से नहीं बल्कि अनारक्षित श्रेणी में नौकरी मिलनी थी. यानी वह आरक्षण के दायरे के बाहर हो जाता है, जिसके बाद 69 हजार शिक्षक भर्ती का पेच उलझ गया. आंदोलनरत अभ्यर्थियों ने कहा कि ओबीसी वर्ग को 27 फीसदी की जगह सिर्फ 3.86 फीसदी ही आरक्षण मिला यानी OBC वर्ग के अभ्यार्थियों को 18,598 सीट में से सिर्फ 2637 सीट मिलीं. जबकि उस वक्त सरकार का कहना था कि करीब 31 हजार ओबीसी वर्ग के लोगों की नियुक्ति की गई.
ठीक इसी तरह SC वर्ग के अभ्यार्थियों ने भी आरोप लगाया है कि 69 हजार शिक्षक भर्ती में से SC वर्ग को भी 21 फीसद की जगह मात्र 16.6 फीसदी ही आरक्षण मिला यानी 69 हजार शिक्षकों की भर्ती में कब लगभग 19 हजार सीटों का घोटाला हुआ. इसको लेकर अभ्यार्थी हाईकोर्ट भी गए और राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग में भी इस मामले की शिकायत की.
हाईकोर्ट के इस फैसले का बाद पिछले 4 सालों से सेवाएं दे रहे हजारों टीचर नौकरी से बाहर हो सकते हैं, लेकिन कोर्ट ये भी कहा कि अगर नई मेरिट लिस्ट बनाते समय कार्यरत शिक्षकों का नुकशान होता है तो उन्हें शेसन यानी सत्र लाभ दिया जाए. यानी वो अपने ही पद पर काम करते रहेंगे.