लखनऊ : बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अपने 37 साल के राजनीतिक सफर में ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां उत्तर प्रदेश की राजनीति में उसका प्रतिनिधित्व लगातार कमजोर होता गया है। 14 अप्रैल 1984 को कांशीराम ने बसपा की स्थापना की थी। इसके बाद पार्टी ने धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाई। 1989 के विधानसभा चुनाव में पहली बार बसपा को हाथी चुनाव चिन्ह मिला और पार्टी के 13 विधायक चुने गए। इसके बाद लगातार चुनावों में बसपा के विधायक और सांसद सदनों तक पहुंचते रहे।
बसपा के राजनीतिक सफर का सबसे मजबूत दौर 2007 में आया, जब मायावती के नेतृत्व में पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। हालांकि, इसके बाद पार्टी का जनाधार लगातार कमजोर होता गया। विधानसभा चुनावों में सीटें घटती गईं और लोकसभा में भी बसपा का प्रदर्शन गिरता चला गया।
अब 37 साल के इतिहास में पहली बार ऐसा समय आया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा, विधान परिषद और लोकसभा में बसपा का कोई सदस्य नहीं है। पार्टी के लिए चुनौती और बढ़ने वाली है, क्योंकि 25 नवंबर 2026 को बसपा के एकमात्र राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल भी समाप्त हो जाएगा। इसके बाद पार्टी चारों सदनों में शून्य हो जाएगी।
पूरे देश की बात करें तो फिलहाल बसपा के सिर्फ दो विधायक हैं। इनमें पंजाब के डॉ. नछत्तर पाल और बिहार के सतीश कुमार यादव शामिल हैं।
अब बसपा की नजर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर है। पार्टी अपने पारंपरिक कोर वोटर्स को दोबारा अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। संगठन को मजबूत करने और खोया जनाधार वापस पाने की कवायद जारी है। ऐसे में 2027 बसपा के लिए सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व और वापसी की बड़ी परीक्षा भी माना जा रहा है।