चंदौली : उत्तर प्रदेश के चंदौली में समाजवादी पार्टी की महिला जिलाध्यक्ष गार्गी सिंह पटेल के साथ हुई बर्बर मारपीट ने प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है. सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बनाया, उसी पार्टी के भीतर अब जातीय वर्चस्व की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी है. घटना के मुताबिक, सपा महिला विंग की जिलाध्यक्ष गार्गी सिंह पटेल को उनके घर में घुसकर बेरहमी से पीटा गया.
आरोप है कि उनके बाल पकड़कर करीब 10 मीटर तक घसीटा गया. एक युवक लगातार उनकी पीठ पर घूंसे बरसाता रहा, जबकि एक महिला लात मारते हुए वीडियो बनाती रही. जब उनकी बहन और एक बुजुर्ग बीच-बचाव करने पहुंचे तो उनके साथ भी मारपीट की गई. मारपीट में गार्गी सिंह पटेल गंभीर रूप से घायल हो गईं. उनकी आंखों में गंभीर चोट आई है. स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया.
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इस मामले में जिन लोगों के नाम सामने आए हैं उनमें प्यारे लाल यादव, मनोज यादव, अमित यादव, डाली और उर्मिला शामिल हैं. खास बात यह है कि आरोपितों को भी समाजवादी पार्टी से जुड़ा बताया जा रहा है. यही वजह है कि अब विपक्ष PDA की राजनीति पर सवाल उठा रहा है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि समाजवादी पार्टी लंबे समय तक यादव-मुस्लिम समीकरण की पार्टी मानी जाती रही है. हालांकि, 2024 के बाद अखिलेश यादव ने PDA फार्मूले के जरिए गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को जोड़ने की रणनीति बनाई.
चंदौली जैसी घटनाएं विरोधियों को यह कहने का मौका दे रही हैं कि पार्टी में अभी भी यादव नेताओं और कार्यकर्ताओं का प्रभाव सबसे ज्यादा है. विपक्ष अब सवाल पूछ रहा है कि जब पीड़ित भी सपा की महिला जिलाध्यक्ष हैं और आरोपित भी पार्टी से जुड़े बताए जा रहे हैं, तब क्या पार्टी अपने ही लोगों पर सख्त कार्रवाई करेगी. क्या PDA सिर्फ चुनावी नारा बनकर रह गया है या जमीन पर सभी वर्गों को बराबरी मिल रही है. फिलहाल चंदौली की यह घटना केवल मारपीट का मामला नहीं रह गई है, बल्कि समाजवादी पार्टी की अंदरूनी राजनीति और उसके PDA मॉडल की वास्तविकता पर भी बड़ा राजनीतिक सवाल बन चुकी है.