नई दिल्ली: "दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे!"
यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि उस माटी के लाल की गर्जना थी जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा गाँव में जन्मे चंद्रशेखर तिवारी कैसे भारतीय क्रांति के सबसे बड़े नायक 'चंद्रशेखर आज़ाद' बने, उनकी बहादुरी और सर्वोच्च बलिदान की यह गाथा आज भी हर भारतीय के खून में देशभक्ति का उबाल भर देती है।
जब 15 साल के बालक ने अदालत में थराया अंग्रेज जज
चंद्रशेखर आज़ाद के भीतर देशभक्ति की ज्वाला बचपन से ही धधक रही थी। वर्ष 1921 में महज 15 साल की उम्र में जब महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया, तो अंग्रेज जज ने कड़क आवाज में पूछा— "तुम्हारा नाम क्या है?"
बालक चंद्रशेखर ने बिना डरे सीना तानकर कहा— "आज़ाद!"
जज ने अगला सवाल दागा— "पिता का नाम?"
जवाब मिला— "स्वतंत्रता!"
जज ने चिढ़कर पूछा— "तुम्हारा घर कहाँ है?"
निडर बालक ने कहा— "जेलखाना!"
इस निर्भीक जवाब से बौखलाए जज ने उन्हें 15 कोड़ों की सजा सुनाई। हर कोड़े की मार पर बालक की चमड़ी उधड़ती रही, लेकिन उनके मुंह से आह की जगह केवल "भारत माता की जय" का जयकारा निकला। उसी दिन से वे देश के लिए 'आज़ाद' हो गए।
काकोरी कांड से लेकर असेंबली बम धमाके का कुशल मार्गदर्शन
राम प्रसाद बिस्मिल्ला, अशफाक उल्ला खान और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आज़ाद ने 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) की कमान संभाली। 1925 का ऐतिहासिक 'काकोरी ट्रेन एक्शन' हो या लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सांडर्स का वध, आज़ाद हर रणनीति के मुख्य सूत्रधार थे। अंग्रेज पुलिस का पूरा गुप्तचर तंत्र उनके पीछे लगा रहा, लेकिन वे हमेशा भेष बदलकर अंग्रेजों की नाक के नीचे से निकल जाते थे।
अल्फ्रेड पार्क का वो ऐतिहासिक दिन: आखिरी गोली और अमर शहादत
27 फरवरी 1931 का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) के अल्फ्रेड पार्क में एक गद्दार की मुखबिरी पर अंग्रेज पुलिस ने आज़ाद को चारों तरफ से घेर लिया।
हाथ में अपनी पसंदीदा माउजर पिस्तौल लिए आज़ाद ने अकेले ही पूरी पुलिस टुकड़ी का मुकाबला किया। कई अंग्रेज सिपाहियों को ढेर करने के बाद जब पिस्तौल में महज एक आखिरी गोली बची, तो उन्होंने अपने उस संकल्प को याद किया— "मैं कभी जीवित अंग्रेजों के हाथ नहीं आऊँगा।" उन्होंने वह अंतिम गोली अपनी कनपटी पर मार ली और भारत माता की गोद में सदा के लिए सो गए।
आज़ाद का जीवन हमें सिखाता है कि गुलामी की साँसों से कहीं बेहतर आजादी के लिए दी गई शहादत होती है। आज उनकी जयंती पर पूरा देश इस महान नायक को नमन करता है।