नई दिल्ली: भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी बात रखने, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और असहमति जताने का मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19) देता है। लेकिन जब 'विरोध प्रदर्शन' की आड़ में सड़कों को बंधक बना लिया जाए, एंबुलेंस का रास्ता रोक दिया जाए, पुलिस पर पथराव हो और आम जनता की ज़िंदगी की गति थम जाए—तो इसे लोकतंत्र नहीं, बल्कि 'खुलेआम अराजकता' कहा जाता है।
दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर लुटियंस ज़ोन तक CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के नाम पर जो तमाशा रचा जा रहा है, उसने अब आम नागरिकों का सब्र तोड़ दिया है। सवाल सीधा है: क्या लोकतंत्र ने आपको आम जनता को परेशान करने की आज़ादी दी है?
संविधान ने अगर आपको विरोध का अधिकार दिया है, तो उसी संविधान ने देश के हर नागरिक को सम्मान से जीने और निर्बाध आवाजाही (Right to Freedom of Movement) का मौलिक अधिकार भी दिया है।
अपनी मांगों को मनवाने के लिए सड़कों पर उपद्रव मचाना, बसों पर चढ़ना और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना कौन सी क्रांति है? जब एक आम नौकरीपेशा इंसान घंटों जाम में फंसता है, जब मरीज अस्पताल पहुँचने के लिए तड़पता है, तब यह आंदोलन 'जनहित' का नहीं, बल्कि 'जन-पीड़ा' का कारण बन जाता है।
जब प्रदर्शनकारी कानून को ठेंगा दिखाते हैं, पुलिस बैरिकेड्स तोड़ते हैं और सुरक्षाकर्मियों को उकसाते हैं, तब कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को सख्त कदम उठाने पड़ते हैं। लेकिन उसके बाद शुरू होता है असली खेल—'विक्टिम कार्ड' और 'सिंपेथी पॉलिटिक्स'।
पहले उकसाओ, फिर कार्रवाई होने पर कैमरे के सामने आकर 'दमन' का रोना रोओ! यह दोहरा रवैया अब देश का जागरूक युवा और नागरिक अच्छी तरह समझ चुका है। अगर आपके इरादे पाक-साफ हैं, तो वार्ता की मेज से भागकर सड़कों पर 'गदर' मचाने की क्या मजबूरी है?
CJP के इस पूरे घटनाक्रम में जिस तरह से राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं, उससे साफ जाहिर होता है कि इस उथल-पुथल का मकसद समस्या का समाधान खोजना कम, और अपना राजनीतिक वजूद चमकाना ज्यादा है। युवाओं के भविष्य के नाम पर जो मजमा लगाया गया है, वह अब पूरी तरह से अराजक तत्वों की शरणस्थली बनता दिख रहा है।
कानून का राज सबसे ऊपर
संवैधानिक व्यवस्था किसी भी संगठन या पार्टी को देश के कानून से ऊपर होने की इजाजत नहीं देती। अगर मांगें जायज हैं, तो उनका तरीका भी संवैधानिक और अनुशासित होना चाहिए। अराजकता फैलाकर, आम आदमी का जीना दूभर करके और पुलिस से उलझकर कोई आंदोलन सफल नहीं होता।
शासन और प्रशासन को चाहिए कि उपद्रवियों और आम प्रदर्शनकारियों के बीच का फर्क समझे—और जो लोग 'CJP' के नाम पर दिल्ली को बंधक बनाने की फिराक में हैं, उन पर कानून की चाबुक पूरी सख्ती से चलाई जाए!