'द सैटेनिक वर्सेज' VS मुसलमान विवाद की वजह क्या है?

Global Bharat 27 Dec 2024 03:38: PM 3 Mins
'द सैटेनिक वर्सेज' VS मुसलमान विवाद की वजह क्या है?

नई दिल्ली: पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने 36 साल पहले सलमान रुश्दी (Salman Rushdie) की विवादास्पद किताब 'द सैटेनिक वर्सेज' (The Satanic Verses) पर प्रतिबंध लगा दिया था. एक बार फिर देश में उसकी बिक्री शुरू होने के कारण यह किताब चर्चा का विषय बनी हुई है. मुस्लिम समुदाय का एक धड़ा इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहा है. सबसे पहले समझते हैं मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों ने क्या कहा...

'ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड' के राष्ट्रीय महासचिव अल्लामा बुनाई हसनी ने आईएएनएस से कहा है, ''बहुत अफसोस की बात है कि जो किताब समाज में अमन-शांति को भंग करता है, जिसको बहुत पहले भारत सरकार ने बैन कर दिया था, अब उस पर से यह पाबंदी हटा ली गई है. किसी आदमी ने इस किताब से पाबंदी हटाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की थी और कोर्ट ने उसकी अपील को स्वीकार करने के लिए किताब से पाबंदी हटा दी है. उन्होंने आगे कहा कि जो किताब समाज में अमन-शांति को भंग करता है, उसको हमारे समाज में खुलेआम नहीं बिकना चाहिए. इस किताब को रखने और बेचने की कोई गुंजाइश नहीं है. ...किताब को भारत जैसे अमन और शांतिप्रिय देश में बिकने की इजाजत देना बहुत ही अफसोसनाक है. इसलिए हमारी सरकार से अपील है कि इस किताब पर देश में पाबंदी लगा दी जाए''.

रजा अकादमी के अध्यक्ष सईद नूरी ने भी 'द सैटेनिक वर्सेज' किताब पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा ''सरकार अपनी मंशा कोर्ट को बताती है और कोर्ट उसी प्रकार से अपना फैसला सुनाती है. साल 1924 से लेकर 2017 तक देश में 50 से अधिक किताबों पर पाबंदी लगाई जा चुकी है. लेकिन 'द सैटेनिक वर्सेज' से ही पाबंदी हटाना बहुत अफसोसजनक है. उन्होंने आगे कहा है कि 1988 में मुंबई में इस किताब को लेकर बवाल हुआ था तो 12 मुसलमानों की मौत हुई थी. इतने बड़े मामले को बहुत हल्के में लिया जा रहा है. साल 1988 में इस किताब और इसके लेखक सलमान रुश्दी के खिलाफ फतवा दिया. इसके बाद 14 फरवरी 1989 को भी एक फतवा आया था, जिस दिन मुंबई में 12 मुसलमानों की मौत हुई थी. इतने संवेदनशील मामले में कोर्ट ने बहुत आसानी से इजाजत दे दी. कोर्ट ने मुसलमानों के जले पर नमक छिड़कने का काम किया है, जबकि कोर्ट को इस पर प्रतिबंध बरकरार रखना चाहिए था. सरकार से हमारी अपील है कि इस पर फिर से पाबंदी लगाई जाए''.

'एआईएमआईएम' नेता वारिस पठान ने 'द सैटेनिक वर्सेज' पर दिल्ली हाईकोर्ट के रुख पर कहा है, ''इस किताब को आए करीब चार दशक हो गए. जब किताब आई थी, तब भी इसका विरोध हुआ था. इसमें कई वाहियात चीजें लिखी हैं, जिसको हम बयां नहीं कर सकते. इस किताब को लेकर काफी विरोध-प्रदर्शन हुआ था. लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने इस किताब से बैन हटा दिया है. मेरी सरकार से गुजारिश है कि वह इसमें हस्तक्षेप करे और दोबारा बैन लगाने की मांग करे. उन्होंने कहा कि फिर से लोगों को भड़काने का काम हो रहा है. वे किस दिशा में देश को ले जाना चाहते हैं. हमारा मानना है कि देश में प्यार, मोहब्बत और भाईचारा बना रहे. हमारी मांगी है कि गंगा-जमुनी तहजीब और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए ऐसी किताब, जो एक समुदाय की भावना को ठेस पहुंचाती है, उस पर लगातार बैन लगे रहना चाहिए''.

विवाद की वजह क्या है?

बता दें कि "द सैटेनिक वर्सेज" सलमान रुश्दी द्वारा लिखित एक विवादास्पद उपन्यास है, जो 1988 में प्रकाशित हुआ था. यह उपन्यास इस्लाम धर्म और पैगंबर मोहम्मद के बारे में विवादास्पद सामग्री के कारण दुनियाभर में विवादों में घिर गया था. उपन्यास के कुछ हिस्सों में इस्लाम धर्म और पैगंबर मोहम्मद के बारे में विवादास्पद सामग्री शामिल है, जिसे कई मुसलमानों ने अपमानजनक और अश्लील माना था. इसके परिणामस्वरूप, उपन्यास के प्रकाशन के बाद विश्वभर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए और कई देशों में उपन्यास पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. उसी दौरान इरान के सर्वोच्च नेता, अयातुल्ला खोमैनी, ने 1989 में सलमान रुश्दी के खिलाफ मौत का फतवा जारी किया, जिसके बाद रुश्दी को कई सालों तक छिपकर रहना पड़ा.

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