गोरखपुर : 2002 में गोरखपुर से शुरू हुई हिंदू युवा वाहिनी एक बार फिर यूपी की राजनीति में चर्चा के केंद्र में है. संगठन के संस्थापक योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में कहा कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में जब प्रशासन कमजोर पड़ा था, तब हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने सड़क पर उतरकर मुकाबला किया. इसी बयान के बाद संगठन की वापसी को लेकर सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है.
हिंदू युवा वाहिनी की स्थापना अप्रैल 2002 में पूर्वांचल में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडे को मजबूत करने के लिए की गई थी. धीरे-धीरे यह संगठन योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन गया. गोरखपुर से लेकर पूरे पूर्वांचल तक वाहिनी ने अपनी मजबूत कैडर फोर्स तैयार की, जिसने योगी की जनसभाओं, आंदोलनों और हिंदुत्व आधारित राजनीति को जमीन पर धार दी.
2017 में योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद हिंदू युवा वाहिनी सबसे ज्यादा विवादों में भी रही. कई घटनाओं के बाद बीजेपी और संघ के भीतर यह चर्चा शुरू हुई कि संगठन समानांतर शक्ति केंद्र बन रहा है, इसके बाद 2022 में योगी आदित्यनाथ ने अचानक इसकी सभी इकाइयों को भंग कर दिया था. माना गया कि संगठन का पुनर्गठन होगा और अनुशासन के साथ नई संरचना बनाई जाएगी.
अब 2026 में जब यूपी की राजनीति फिर हिंदुत्व बनाम विपक्ष के नैरेटिव पर लौटती दिख रही है, तब योगी का हिंदू युवा वाहिनी का जिक्र करना बेहद अहम माना जा रहा है. हाल के दिनों में कानून व्यवस्था, नमाज, धार्मिक पहचान और हिंदुत्व वाले मुद्दों पर योगी लगातार आक्रामक बयान दे रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 चुनाव से पहले योगी अपना पुराना कोर कैडर फिर सक्रिय करने के संकेत दे रहे हैं.
बीजेपी के भीतर भी यह माना जाता है कि हिंदू युवा वाहिनी सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि योगी आदित्यनाथ की सड़क वाली राजनीति की पहचान रही है. यही वजह है कि जैसे ही योगी ने मंच से इसका नाम लिया, विपक्ष ने इसे 2027 की तैयारी और हिंदुत्व कार्ड की नई शुरुआत बताना शुरू कर दिया.