जो राहुल गांधी देशभर में जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं, वो हरियाणा में अपनी ही बनाई जाति के जंजाल में कैसे फंस गए, जहां-जहां इन्होंने रैलियां की, वहां क्या हाल हुआ, किसान आंदोलन का समर्थन और पहलवानों की पैरवी का कितना फायदा या नुकसान कांग्रेस को हुआ, ये सुनकर शायद सोनिया गांधी भी सिर पकड़ लें. ये हरियाणा के जातियों के आंकड़े हैं. हरियाणा में कुल 22 प्रतिशत जाट वोटर, 21 प्रतिशत वोट एससी वोटर, 7.5 फीसदी ब्राह्माण और 5 प्रतिशत यादव वोटर्स हैं. इसके अलावा 3.8 प्रतिशत मुस्लिम/मेव वोटर्स भी हैं.
इनमें से मुस्लिमों और कुछ जाटों को छोड़ दें तो बाकी सबने बीजेपी को भर-भरकर वोट दिया, क्योंकि वहां की जनता को ये बात समझ आ गई कि हमारे जवानों, पहलवानों और किसानों को कैसे अपने सियासी फायदे के लिए कांग्रेस आगे कर रही है, और इससे नुकसान प्रदेश का हो रहा है, यहां तक कि कांग्रेस भी दो गुटों में बंट गई, जिसमें पहला गुट था हुड्डा गुट और दूसरा शैलजा गुट. हुड्डा गुट के ज्यादातर नेताओं को हाईकमान ने आंख बंदकर टिकट बांटे, लेकिन वहां लोगों में ये मैसेज गया कि हुड्डा का दौर आया तो पर्ची और खर्ची वाला सिस्टम फिर शुरू हो जाएगा, आम लोगों को नौकरियां नहीं मिलेगी. क्योंकि जहां से ज्यादा लोग वोट देंगे, वहां से ज्यादा लोगों को नौकरी देने वाले आरोप कई बार हुड्डा गुट पर लगे हैं. नतीजा ये हुआ कि राहुल गांधी जहां-जहां रैली करने गए, वहां भीड़ ने स्वागत तो उत्साह से किया, पर वो भीड़ वोट में तब्दील नहीं हो पाई.
राहुल गांधी 26 सितंबर से हरियाणा चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हैं, पहली ही रैली करनाल जिले के असंध विधानसभा क्षेत्र में करते हैं, करनाल से ही पूर्व सीएम मनोहर लाल आते हैं, इसलिए बीजेपी के लिए ये सम्मान की लड़ाई थी, नतीजा राहुल की पहली रैली का खास फायदा कांग्रेस को नहीं हुआ, बीजेपी उम्मीदवार योगेन्द्र सिंह राणा ने कांग्रेस प्रत्याशी को तगड़ी टक्कर दी. उसी दिन राहुल गांधी हिसार के बरवाला में जनसभा करते हैं, पर वहां भी बीजेपी के रणवीर गंगवार भारी पड़ते हैं. ये वो दोनों सीटें थी, जहां खुद राहुल को भी नतीजे पता थे, इसीलिए 30 सितंबर को हरियाणा विजय संकल्प यात्रा की शुरुआत करते हैं. पहले ही दिन अंबाला के नारायणगढ़ में जनसभा करते हैं, कांग्रेस की शैली चौधरी वहां कमाल करती हैं., कुरुक्षेत्र की थानेसर सीट पर भी कांग्रेस को फायदा होता दिखता है, लेकिन सोनीपत के गोहाना में कांग्रेस फंस जाती है, ये वो जगह थी, जहां राहुल ने जलेबी फैक्ट्री वाली बात कही थी.
लेकिन गोहाना की जनता को लगता है जलेबी फैक्ट्री पसंद नहीं आई, और बीजेपी के अरविंद शर्मा विधानसभा की दहलीज पर नजर आने लगे. अगर राहुल को कहीं फायदा हुआ तो वो है नूंह, जहां 3 अक्टूबर को रैली के बाद यहां की तीनों सीटें मुस्लिम प्रत्याशियों ने जीत ली. महेन्द्रगढ़ में राहुल ने जहां आखिरी रैली की, वहां भी कांग्रेस की हालत ठीक-ठाक नजर आती है, लेकिन सवाल ये है कि जब एग्जिट पोल से लेकर ग्राउंड रिपोर्ट तक में ये कहा जा रहा था कि राहुल इस बार कमाल कर देंगे, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा दोनों बीजेपी के हाथ से निकल जाएगा, बीच नवरात्रि मोदी-योगी को बड़ा झटका लगेगा, तो ऐसा क्या हुआ कि पूरा माहौल बदल गया, इसकी कहानी 5 अक्टूबर को हुई वोटिंग के नतीजों से भी आप समझ सकते हैं. जब अयोध्या की तर्ज पर मुस्लिम वोटर्स ने एकजुट होकर बीजेपी के खिलाफ वोट किया, और वो तस्वीरें देखकर हिंदुओं में ऐसी भावना जगी कि वो जाति-पाति भूलकर न सिर्फ बूथ पर लाइन लगाकर खड़े हो गए, बल्कि उन्होंने खुद ही बीजेपी को जीताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, और चूंकि इस बार आरएसएस भी बीजेपी के पीछे खड़ी थी, तो खेल आसान हो गया.