तकनीकी सपनों को हकीकत में बदल रही है आईआईटी कानपुर-NYU की साझेदारी

Global Bharat 25 Apr 2026 12:40: PM 6 Mins
तकनीकी सपनों को हकीकत में बदल रही है आईआईटी कानपुर-NYU की साझेदारी

नई दिल्ली/वाशिंगटन: जैसे-जैसे विश्वविद्यालय उन्नत प्रौद्योगिकियों में सहयोग को गहन कर रहे हैं, शैक्षणिक साझेदारियां अब केवल साझा अनुसंधान परिणामों पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी अधिक ध्यान केंद्रित कर रही हैं कि वे आइडिया को ​ क्रियान्वित किए जा सकने वाले समाधानों में कितनी प्रभावी ढंग से बदलती हैं.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर (आईआईटीके) और न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के टंडन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग (एनवाईयूटी) के बीच सहयोग इस बदलाव को दर्शाता है, जो साइबर सुरक्षा, जैव प्रौद्योगिकी, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, और वायरलेस संचार में संयुक्त अनुसंधान को एक साथ ला रहा है.

''हमने औपचारिक समझौते के पहले वर्ष के भीतर सात संयुक्त अनुसंधान परियोजनाएँ शुरू कीं, जो इस प्रकार की साझेदारी के लिए असाधारण रूप से तेज है,'' एनवाईयू टंडन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग के कार्यकारी डीन और वैश्विक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के कार्यकारी उपाध्यक्ष जुआन डि पाब्लो कहते हैं. ''आईआईटी कानपुर में एनवाईयू टंडन-आईआईटीके एडवांस्ड रिसर्च सेंटर इस सहयोग को एक स्थायी आधार प्रदान करता है. और हमारा डॉक्टरल डुअल-डिग्री कार्यक्रम ऐसे शोधकर्ताओं को प्रशिक्षित कर रहा है जिनके दोनों पक्षों से वास्तविक संस्थागत संबंध हैं.''

यह सहयोग 2016 में शुरू हुआ जब एनवाईयू टंडन साइबर सिक्योरिटी अवेयरनेस वीक का विस्तार भारत तक हुआ, जिसमें आईआईटी कानपुर ने प्रतियोगिता की मेज़बानी की. इस प्रारंभिक जुड़ाव ने एक व्यापक, बहु-क्षेत्रीय अनुसंधान साझेदारी की नींव रखी, जिसमें महत्वपूर्ण क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान के लिए 2023 में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए.

यह सतत सहयोग प्रतिभा, इंफ्रास्ट्रक्चर, और अनुसंधान पारिस्थितिक तंत्रों में पूरक संस्थागत ताकतों पर आधारित है.

''ऐसी साझेदारियाँ इसलिए काम करती हैं क्योंकि दोनों संस्थान अपने साथ कुछ अनूठा लेकर आते हैं,'' आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रोफेसर मणिंद्र अग्रवाल कहते हैं. ''भारत में, हमारे पास इंजीनियरिंग प्रतिभा का एक विशाल भंडार है, और जैव प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में हाल के विकास ने यह प्रदर्शित किया है कि भारत वैश्विक समस्याओं के लिए कम लागत वाले समाधानों के विकास में अग्रणी है.'' दूसरी ओर, अमेरिकी विश्वविद्यालयों के पास अच्छी अनुसंधान इंफ्रास्ट्रक्चर और महत्वपूर्ण अनुसंधान वित्तपोषण तक पहुँच है. ''ताकतों में यह पूरकता ही वास्तव में आईआईटीके-एनवाईयू साझेदारी को सफल बनाती है.''

डि पाब्लो भी इस भावना को दोहराते हैं, यह बताते हुए कि एनवाईयू साइबर सुरक्षा और 6जी वायरलेस में वैश्विक स्तर पर पहचान वाले केंद्र लाता है, साथ ही एक न्यूयॉर्क पारिस्थितिकी तंत्र जो वाणिज्यीकरण के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि आईआईटीके एक अत्यधिक प्रतिस्पर्धी संकाय, विद्यार्थी आधार, और भारत के पैमाने पर संचालन का अनुभव प्रदान करता है.

प्रयोगशाला अनुसंधान से वास्तविक दुनिया की प्रणालियों तक

पूरक ताकतों पर यह ध्यान सबसे स्पष्ट रूप से उन प्रौद्योगिकियों की श्रृंखला में दिखाई देता है जिन्हें यह साझेदारी आगे बढ़ा रही है. आईआईटीके-एनवाईयू सहयोग का एक प्रमुख क्षेत्र आपूर्ति शृंखलाओं और जैव-चिकित्सीय अनुप्रयोगों के लिए सुरक्षित प्रमाणीकरण प्रणालियों पर केंद्रित है, विशेष रूप से भौतिक रूप से अपरिवर्तनीय सामग्रियों और बायोचिप प्रौद्योगिकियों के माध्यम से. अनुसंधान टीमों ने ऐसे फिंगरप्रिंटिंग सिस्टम विकसित किए हैं जो प्रमाणीकरण के लिए अद्वितीय पहचान चिह्न उत्पन्न करते हैं.

इन पैटर्नों को मशीन लर्निंग मॉडल का उपयोग करके प्रोसेस किया जाता है ताकि शोरयुक्त परिस्थितियों में उच्च-सटीकता पहचान सक्षम हो सके. इससे अत्यधिक सुरक्षित, कठिन-से-नकल किए जा सकने वाली पहचान प्रणालियाँ बनाना संभव हो जाता है. ये प्रणालियाँ आपूर्ति शृंखलाओं में नकली उत्पादों को रोकने और संवेदनशील जैव-चिकित्सीय अनुप्रयोगों में विश्वसनीय प्रमाणीकरण सुनिश्चित करने में मदद कर सकती हैं.

अग्रवाल के अनुसार, यह प्रणाली सटीकता और लचीलापन दोनों प्राप्त करती है. ''इन भौतिक विशेषताओं को डीप लर्निंग तकनीकों का उपयोग करके प्रोसेस और प्रमाणित किया जाता है, जिससे 95.8 प्रतिशत सटीकता प्राप्त होती है और  विरुद्ध शोर के खिलाफ मजबूती प्रदर्शित होती है,'' वह बताते हैं.

सुरक्षित प्रणालियों से आगे, यह सहयोग जैव-चिकित्सीय अनुसंधान तक विस्तृत है, जहाँ साझेदारी चिकित्सीय तरीकों का अन्वेषण कर रही है. डे पाब्लो इस दिशा के महत्व का वर्णन करते हैं. ''उदाहरण के लिए, एक ऐसे विशेष प्रोटीन का विकास जिसे इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि वह जीवित रहने के एक महत्वपूर्ण संकेत को काट दे जो कैंसर ट्यूमर  को बढ़ते रहने की अनुमति देता है, जिससे कैंसर उपचार के लिए एक संभावित नया मार्ग मिलता है,'' वह कहते हैं.

वह जोड़ते हैं कि जोर दीर्घकालिक सैद्धांतिक अन्वेषण के बजाय तात्कालिक अनुप्रयोग पर है. ''मुझे लगता है कि इस काम की सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी वास्तविक दुनिया में तत्काल प्रासंगिकता है,'' वह कहते हैं.

इसी प्रकार का व्यावहारिक फोकस उन्नत इंजीनियरिंग प्रणालियों तक विस्तारित होता है. सहयोग का एक प्रमुख क्षेत्र वायरलेस पावर ट्रांसफर और रेडियो फ्रीक्वेंसी रेंज में कार्य करने वाली इंजीनियर्ड सतहों के डिजाइन से संबंधित है. प्रोफेसर अग्रवाल इसे प्रणाली-उन्मुख इंजीनियरिंग अनुसंधान के रूप में वर्णित करते हैं. ''यह कार्य इंजीनियर्ड सतहों का उपयोग करके विद्युत-चुंबकीय तरंगों को सकेंद्रित करने पर आधारित था, ताकि कुशलता के साथ वायरलेस पावर ट्रांसफर संभव हो सके.'' वह कहते हैं, यह अनुसंधान महत्वपूर्ण है क्योंकि टीम उन्नत एंटेना विकसित कर रही है, जो इंजीनियर्ड सतहों का उपयोग करके सिगनल को एक विशिष्ट दिशा में अधिक दक्षता से निर्देशित करते हैं. यह दृष्टिकोण मिलीमीटर-स्तरीय बायोमेडिकल इम्प्लांट्स तक पावर ट्रांसफर में सुधार के लिए मजबूत संभावनाएं रखता है.

कार्यान्वयन को आगे बढ़ाना
इस सहयोग की एक प्रमुख विशेषता अनुसंधान को क्रिया​न्वित किए जा सकने वाली प्रौद्योगिकियों और वाणिज्यिक अनुप्रयोगों में बदलने पर इसका ध्यान है.

डे पाब्लो कई परियोजनाओं पर प्रकाश डालते हैं जिन्हें स्पष्ट रूप से वाणिज्यीकरण को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन किया गया है, जिनमें उन्नत सुरक्षा विशेषताओं को एकीकृत करने वाले वायरलेस इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग सिस्टम शामिल हैं. ''हमारी सभी संयुक्त परियोजनाएँ एक ही सिद्धांत को दर्शाती हैं: ऐसा अनुसंधान जिसे पहले दिन से ही वास्तविक कार्यान्वयन के लिए डिज़ाइन किया गया है.''

वह सहयोग से उभर रहे प्रारंभिक बौद्धिक संपदा परिणामों की ओर भी इशारा करते हैं, विशेष रूप से एक बायोचिप प्रमाणीकरण प्रौद्योगिकी, जिसके परिणामस्वरूप पहले ही एक अमेरिकी पेटेंट आवेदन दायर किया जा चुका है, जो लंबित  है.

प्रोफेसर अग्रवाल इस बात पर जोर देते हैं कि संयुक्त संरचनाएँ और वित्तपोषण तंत्र अनुसंधान से अनुप्रयोग तक तेज प्रगति को सक्षम बनाते हैं. ''साथ काम करने वाले शोधकर्ताओं को प्रमुख वित्तपोषण अवसरों और उन्नत अनुसंधान सुविधाओं तक पहुँच मिलती है,'' वह कहते हैं.

रणनीतिक प्रौद्योगिकी साझेदारियों को आगे बढ़ाना
दोनों संस्थान इस साझेदारी को उन्नत प्रौद्योगिकियों में अमेरिका-भारत सहयोग के व्यापक मिलन के हिस्से के रूप में देखते हैं.

''अमेरिका और भारत के पास कई पूरक ताकतें हैं,'' अग्रवाल कहते हैं, यह जोड़ते हुए कि इस तरह के सहयोग महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों में अग्रणी अनुसंधान के लिए उनकी विशिष्ट क्षमताओं को एक साथ ला सकते हैं.

आगे बढ़ते हुए, डे पाब्लो कहते हैं कि ऐसे कई अनुसंधान क्षेत्र हैं जिनमें एनवाईयू टंडन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग बड़े निवेश कर रहा है. इनमें एआई और रोबोटिक्स, क्वांटम सूचना विज्ञान, चिप डिज़ाइन, सामग्री विज्ञान, प्रणाली इंजीनियरिंग, और स्मार्ट शहर शामिल हैं. ''हम इन क्षेत्रों में आईआईटी कानपुर के साथ साझेदारी का विस्तार करने के लिए उत्सुक हैं,'' वह कहते हैं.

वह जोड़ते हैं कि यह सहयोग दोनों देशों के बीच एक व्यापक संरचनात्मक संतुलन को दर्शाता है. ''भारत के पास इंजीनियरिंग प्रतिभा का भंडार, घरेलू पैमाना, और इन क्षेत्रों में नेतृत्व करने की बढ़ती महत्वाकांक्षा है. अमेरिका अनुसंधान इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक उद्योग नेटवर्क लाता है. किसी भी देश या विश्वविद्यालय के पास अपने दम पर आवश्यक सभी चीजें नहीं हैं,'' वह कहते हैं.

''जब दोनों देशों के संस्थान केवल हस्ताक्षरित समझौतों से आगे बढ़कर वास्तविक कार्य संबंध बनाते हैं, तो वे ऐसी तकनीकी क्षमता विकसित करते हैं जो किसी भी एकल अनुसंधान परियोजना से कहीं अधिक टिकाऊ होती है.''

ज़हूर हुसैन बट: लेखक

सौजन्य: स्पैन

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