नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच हो रहे शांति समझौते में $300 बिलियन (करीब 25 लाख करोड़ रुपए) का बड़ा आर्थिक मुद्दा सबसे बड़ा 'कमजोर कड़ी' बन गया है. ईरान इस राशि को युद्ध क्षति के मुआवजे के रूप में देख रहा है, जबकि अमेरिका इसे पुनर्निर्माण और निवेश के रूप में पेश कर रहा है.
ईरानी मीडिया (मेहर न्यूज) के अनुसार, दोनों देशों के बीच 14-पॉइंट प्रारंभिक Memorandum of Understanding (MoU) तैयार हो चुका है, जिसे 19 जून 2026 को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षरित किया जाना है. इसमें ईरान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों से $300 बिलियन का पुनर्निर्माण पैकेज मांगा है. साथ ही $24 बिलियन फ्रोजन एसेट्स की रिहाई, तेल और पेट्रोकेमिकल्स पर प्रतिबंधों में छूट तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने की मांग शामिल है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बताया है और कहा है कि इससे वैश्विक तेल बाजार स्थिर होगा. लेकिन ईरान इसे युद्ध के बाद के मुआवजे के रूप में पेश कर रहा है. अमेरिका इसे निजी निवेश और अंतरराष्ट्रीय फंड के रूप में देख रहा है, जबकि तेहरान इसे क्षतिपूर्ति मान रहा है.
समझौते की मुख्य बातें
विशेषज्ञों का कहना है कि $300 बिलियन का यह मुद्दा समझौते को कमजोर कर सकता है. अगर दोनों पक्षों के बीच व्याख्या का अंतर बना रहा तो शांति समझौता दोबारा टूटने का खतरा है. इजरायल पहले ही इस डील पर आपत्ति जता चुका है, खासकर लेबनान से जुड़े प्रावधानों को लेकर. MoU अभी प्रारंभिक चरण में है और कई महत्वपूर्ण बिंदु अभी भी विवादास्पद हैं. आने वाले दिनों में इसकी सत्यता और अंतिम रूप साफ होने वाला है.