नई दिल्ली: पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश। बीते कुछ सालों में भारत के इन चारों पड़ोसी देशों में भारी राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिली है और वहाँ के राष्ट्राध्यक्षों को जनाक्रोश या तख्तापलट के कारण अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी है। अब देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) और NEET अभ्यर्थियों के उग्र होते आंदोलन ने एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत में भी विदेशी खुफिया एजेंसियों, खासकर अमेरिका की 'CIA', के इशारे पर 'रिजीम चेंज' (सत्ता परिवर्तन) का वही मॉडल लागू किया जा रहा है?
4 देशों में तख्तापलट और 'विदेशी हाथ' का पैटर्न
दक्षिण एशिया में उथल-पुथल का यह पैटर्न श्रीलंका से शुरू हुआ, जहाँ 'अरागालया' (जन-आंदोलन) के ज़रिए राष्ट्रपति भवन पर कब्ज़ा कर गोटाबाया राजपक्षे को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया। इसके बाद पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार गिरी, तो उन्होंने बाकायदा अमेरिकी 'साइफर' का हवाला देकर अपनी बेदखली के पीछे अमेरिका का हाथ बताया।
यही कहानी नेपाल में दोहराई गई, जहाँ वामपंथी-लोकतांत्रिक गुटों की खींचतान और सरकारों के तेज़ी से गिरने के पीछे अमेरिकी MCC प्रोजेक्ट और विदेशी शक्तियों की दखलअंदाज़ी के आरोप लगातार लगते रहे। हाल ही में बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना ने भी खुलकर आरोप लगाया कि सेंट मार्टिन द्वीप न देने के कारण एक विदेशी ताकत ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया।
दिल्ली का CJP आंदोलन और 'CIA' थ्योरी
अब यही पैटर्न भारत में तलाशा जा रहा है। कभी आम आदमी पार्टी में काम करने वाले अभिजीत दिपके अमेरिका में बैठ कर ही सोशल मीडिया पर ही एक पार्टी बनाते हैं, देखते ही देखते इस पार्टी के फॉलोअर्स की संख्या करोड़ों में पहुंच जाती है। फिर जब अभिजीत की वतन वापसी होती है तो उनके साथ विदेश से कुछ लोग भी आते हैं। पहले दिन प्रदर्शन फ्लॉफ साबित होता है। पूरे देश में मजाक बनाया जाता है। लेकिन अब जंतर-मंतर पर CJP के बैनर तले जारी विरोध प्रदर्शन, छात्रों के उग्र मार्च और सोशल मीडिया पर अचानक उभरे अभियानों को लेकर सुरक्षा और खुफिया हलकों में चिंता बढ़ी है।
दावा किया जा रहा है कि भारत की स्थिर और आर्थिक रूप से मजबूत सरकार को अस्थिर करने के लिए विदेशी एनजीओ (NGOs) और CIA जैसी एजेंसियों से बैक-डोर फंडिंग के ज़रिए 'कलर रिवोल्यूशन' (सड़क पर अराजकता फैलाकर सत्ता परिवर्तन) की पटकथा लिखी जा रही है। आंदोलन की टाइमिंग और अंतराष्ट्रीय मीडिया का रुख इन शंकाओं को और बल दे रहा है।
क्या जा सकती है पीएम मोदी की कुर्सी?
श्रीलंका, नेपाल या बांग्लादेश की तरह क्या भारत में भी तख्तापलट संभव है? विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था, मजबूत लोकतान्त्रिक जड़ें और अनुशासित सैन्य तंत्र इसे पड़ोसी देशों से पूरी तरह अलग बनाते हैं। भारत में सत्ता केवल जन-जनादेश यानी 'वोट' से बदलती है। तो वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कई दशक का राजनीतिक अनुभव है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने कई बार ऐसी स्थितियों का सामना किया है जब सब उनके खिलाफ हो चुके थे। बावजूद इसके आज तक गुजरात से बीजेपी की विदाई नहीं हो सकी। वैश्विक स्तर पर पीएम मोदी की छवि आज एक बहुत बड़े नेता के रूप में बन चुकी है। RSS का सपोर्ट और अमित शाह, राजनाथ सिंह जैसे नेताओं का साथ उन्हें और भी मजबूत बना देता है। सबसे बड़ी बात ये है कि आज भी भारत के गांवों में लोग मोदी को भरपूर समर्थन देते हैं। जिससे विदेशी ताकतों की ये साजिश भारत में कामयाब होती नजर नहीं आती। हालांकि, दिल्ली की सड़कों पर सुनियोजित तरीके से रचे जा रहे इस नए नैरेटिव ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद ज़रूर उड़ा दी है।