Jantar Mantar Protest : धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के साथ ही क्या सीजेपी का काउंटडाउन शुरू हो गया. साज़िश के उस तार का ज़िक्र होने लगा. सिविल वॉर की तैयारी थी. जिसकी आशंका दिखने लगी थी. टूलकिट गैंग ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के पीछे ऐसा खेल रचा था, जिसकी भनक IB, RAW और दिल्ली पुलिस के हाथों लग चुकी थी. क्योंकि इस्तीफ़े के बाद ही CJP को लेकर कुछ हैरान करने वाला सच सामने आ रहा है. 50 दिनों से आंदोलन चल रहा था.
Gen-Z के आंदोलन में औसतन 25-30 साल की उम्र के लोग पहुंच रहे थे. आंखों से आंदोलन देखने का अनुभव था. वीडियो में जैसा आंदोलन दिख रहा था, वैसा बिल्कुल नहीं था. अमित शाह और मोदी अमेरिका की आंखों में क्यों चुभ रहे हैं.
बंगाल चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत ही इस पूरे विवाद की नींव बनती है. अमेरिका डीप स्टेट के हाथ से भारत लगभग बाहर निकल रहा था. बंगाल जीत के बाद ही अमित शाह ने दावा किया था—त्रिपुरा, बंगाल और असम हमारे पास हैं. अब भारत की डेमोग्राफी नहीं बदली जा सकती है. बंगाल चुनाव के बाद US सेक्रेटरी ऑफ स्टेट पहली बार भारत आते हैं और सबसे पहले कोलकाता जाते हैं, वो भी मदर टेरेसा के मिशनरी में.
US के लिए भारत में अपना प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए मिशनरी और एनजीओ ही सबसे ज़्यादा सहायक होते हैं. FCRA यानी विदेश से आने वाले चंदे के नियमों में सुधार कर पहले ही भारत ने कई विदेशी फंडिंग वाले NGOs पर नकेल कस दी है और उसके बाद देश के करीब-करीब 90% राज्यों पर BJP-NDA के कंट्रोल में आने के बाद डीप स्टेट की बौखलाहट और बढ़ गई.
इसीलिए छात्र आंदोलन के नाम पर देशहित को ताक पर रखकर विरोधी ताकतों को साथ लाकर खड़ा किया. बीजेपी राष्ट्र के लिए कुछ ऐसा फैसला लेने वाली थी, जिसके बाद विदेशी ताकतों की कमर टूट जाती. इस घबराहट से साफ़ दर्शाता है कि देश विरोधी ताकतें मिलकर देश में सिविल वॉर चाहती थीं, जिसका ज़िक्र इस्तीफ़ा पत्र में भी किया गया है.
धर्मेंद्र प्रधान साफ़ लिखते हैं कि देश के युवाओं के आंदोलन में विदेशी ताकतें अपना फायदा न देख पाएं, इसलिए इस्तीफ़ा दे रहा हूं. दरअसल, सोमवार को फिर से संसद मार्च की तैयारी थी. इसके लिए हर ज़िले से लोग पहुंच रहे थे. देश के हर कोने से लोग जंतर-मंतर पर जमा हो रहे थे. संसद का घेराव इस बार होता, तो शायद हालात नेपाल और श्रीलंका जैसे ही होते, क्योंकि खुलकर पॉलिटिकल पार्टियां भी साथ खड़ी थीं. इसलिए सरकार ने शनिवार को अचानक ही इस्तीफ़े का ऐलान कर दिया.
जिस सिविल वॉर की तैयारी थी, उसकी साज़िश अब धरी की धरी रह गई है. क्योंकि युवाओं के आंदोलन में देश विरोधी ताकतें किसी हद तक जा सकती थीं. अमेरिका और पाकिस्तान की साज़िशें शायद अब कामयाब न हो पाएं, क्योंकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के साथ ही CJP की भीड़ लौटने लगी है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को घेरा था. ये संदेश था कि सरकार के मंत्रियों और नेताओं की हालत ठीक नेपाल जैसी होनी चाहिए थी, लेकिन राहुल गांधी का मंसूबा एक बार फिर फेल हो गया.