नई दिल्ली: इन दिनों आईवियर कंपनी लेंसकार्ट एक कथित ड्रेसकोड विवाद को लेकर सुर्खियों में है. सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक इंटरनल गाइडलाइन के बाद आरोप लगाए गए कि कंपनी में धार्मिक प्रतीकों को लेकर अलग-अलग नियम अपनाए जा रहे हैं. चर्चा तब तेज हुई जब दावा किया गया कि कुछ मामलों में हिजाब या बुर्का की अनुमति दी गई, लेकिन माथे पर तिलक या टीका लगाने पर रोक जैसी स्थिति बनाई गई.
इस विवाद के बाद सोशल मीडिया पर कंपनी के खिलाफ बहिष्कार की मांग भी उठी और मामला तेजी से ट्रेंड करने लगा. हालांकि कंपनी की तरफ से स्थिति साफ करने की कोशिश की गई और कहा गया कि उनका ड्रेसकोड किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं है और सभी कर्मचारियों के लिए समान नियम लागू होते हैं.
लेंसकार्ट की शुरुआत 2010 में पीयूष बंसल और उनके सहयोगियों द्वारा एक स्टार्टअप के रूप में की गई थी. आज यह कंपनी भारत की सबसे बड़ी आईवियर रिटेल चेन में से एक बन चुकी है, जिसके हजारों स्टोर्स देशभर में फैले हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी मौजूदगी है.
कंपनी की हिस्सेदारी और निवेश को लेकर भी लोगों में काफी दिलचस्पी देखी जा रही है. इसमें कई बड़े वैश्विक और घरेलू निवेशकों की भागीदारी रही है. शुरुआती निवेशकों में रतन टाटा का नाम भी शामिल रहा, जिन्होंने शुरुआती दौर में इसमें निवेश किया था, हालांकि बाद में उन्होंने अपनी हिस्सेदारी बेच दी.
इसके अलावा जापान की निवेश कंपनी सॉफ्टबैंक भी इसके बड़े निवेशकों में से एक रही है. वहीं सिंगापुर की सरकारी निवेश संस्था टेमासेक और अन्य वैश्विक फंड्स ने भी इसमें महत्वपूर्ण पूंजी लगाई है. भारतीय निवेश क्षेत्र से जुड़े कुछ बड़े फंड्स ने भी समय-समय पर इसमें निवेश किया है.
हाल के विवाद का असर कंपनी के बाजार प्रदर्शन पर भी देखने को मिला, जहां शेयरों में उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया. हालांकि कंपनी के स्पष्टीकरण के बाद कुछ हद तक स्थिति स्थिर होती दिखाई दी.
कुल मिलाकर यह मामला सिर्फ एक ड्रेसकोड विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे कंपनी की छवि, निवेश संरचना और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया तीनों पर चर्चा तेज हो गई है.