कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के ठीक बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में टूट की आशंका गहरा गई है. पार्टी के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन में महज 35 विधायक ही पहुंचे, जबकि कुल 80 TMC विधायकों में से बाकी आधे से ज्यादा गायब रहे. इस घटना ने सियासी गलियारों में पार्टी के अंदरूनी कलह और संगठनात्मक कमजोरी को लेकर चर्चा तेज कर दी है.
बुधवार को विधानसभा परिसर में डॉ. बी.आर. अंबेडकर की प्रतिमा के पास TMC विधायकों ने चुनाव के बाद हुई कथित हिंसा, बुलडोजर कार्रवाई और फेरीवालों पर अतिक्रमण हटाने के अभियान के खिलाफ धरना दिया. यह सत्ता से विपक्ष में आने के बाद पार्टी का पहला समन्वित आंदोलन था.
उपस्थिति कम, सवाल ज्यादा
शोभनदेव चट्टोपाध्याय, नयना बनर्जी, कुणाल घोष और ऋतब्रत बनर्जी जैसे नेता मौजूद रहे, लेकिन कुल संख्या बेहद कम रही. TMC के वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने आंतरिक कलह की खबरों को खारिज करते हुए कहा कि कई विधायक चुनाव के बाद हिंसा प्रभावित इलाकों में कार्यकर्ताओं के साथ व्यस्त थे. साथ ही कार्यक्रम सिर्फ एक दिन के नोटिस पर बुलाया गया था, इसलिए दूर के विधायक नहीं पहुंच पाए. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इस कम उपस्थिति को महज लॉजिस्टिक समस्या नहीं मान रहे. वे इसे पार्टी के भीतर असंतोष और नेतृत्व पर सवालों का संकेत बता रहे हैं.
कालीघाट बैठक के ठीक बाद घटना
यह विरोध प्रदर्शन मंगलवार को ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की मौजूदगी वाली कालीघाट बैठक के महज एक दिन बाद हुआ. सूत्रों के अनुसार, उस बैठक में कई विधायकों ने पार्टी को सड़कों पर उतरकर जनता से जुड़ने की जरूरत पर जोर दिया था. कुछ नेताओं ने बंद कमरों की बैठकों से कोई फायदा न होने की बात भी कही.
15 साल सत्ता में रहने के बाद अचानक विपक्ष में जाने का झटका TMC के लिए काफी भारी पड़ रहा है. अब सवाल यह है कि क्या पार्टी इस हार से उबर पाएगी या अंदरूनी दरारें और गहरी होंगी? यह घटना ममता बनर्जी की TMC के भविष्य को लेकर नई अटकलों को जन्म दे रही है.