मऊ में भरत मिलाप के दौरान उपजा विवाद, शहर में भड़की थी हिंसा, 17 की मौत, योगी आदित्यनाथ न भूलने की कहीं बात

Global Bharat 30 May 2026 01:49: AM 1 Mins
मऊ में भरत मिलाप के दौरान उपजा विवाद, शहर में भड़की थी हिंसा, 17 की मौत, योगी आदित्यनाथ न भूलने की कहीं बात

मऊ : 14 अक्टूबर 2005 को उत्तर प्रदेश का मऊ शहर भीषण साम्प्रदायिक हिंसा की चपेट में आ गया, जिसे बाद में मऊ दंगा के नाम से जाना गया. यह घटना शाही कटरा मैदान में आयोजित रामलीला के भरत मिलाप कार्यक्रम के दौरान शुरू हुए एक छोटे से विवाद से उत्पन्न हुई, जिसने देखते ही देखते पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया. तत्कालीन रिपोर्टों के अनुसार, कार्यक्रम के दौरान माइक का तार टूटने या नोचे जाने की घटना के बाद तनाव की स्थिति पैदा हो गई, इसके बाद स्थानीय स्तर पर दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ा और पुलिस ने कुछ लोगों को हिरासत में लिया. हालांकि, यह मामला शांत होने के बजाय और अधिक गंभीर होता चला गया.

इसी दौरान उस समय के स्थानीय राजनीतिक वातावरण में सक्रिय नेता और तत्कालीन विधायक मुख्तार अंसारी की भूमिका को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए. कुछ रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि घटनाक्रम के दौरान उनके प्रभाव और हस्तक्षेप से स्थिति और तनावपूर्ण हुई, जबकि अन्य पक्षों का कहना था कि हालात पहले से ही संवेदनशील थे और भीड़ नियंत्रण से बाहर हो गई थी.

तनाव बढ़ने के बाद शहर के विभिन्न हिस्सों में हिंसा, आगजनी और पथराव की घटनाएं सामने आईं. दुकानों और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया और कई इलाकों में हालात बेकाबू हो गए. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कुछ ही घंटों में पूरा शहर अशांति की चपेट में आ गया और लोग अपने घरों में छिपने को मजबूर हो गए.

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने कर्फ्यू लागू किया, लेकिन इसके बावजूद कई दिनों तक हिंसा की छिटपुट घटनाएं जारी रहीं.सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस दंगे में लगभग 17 लोगों की मौत हुई, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए और संपत्ति का भारी नुकसान हुआ. शहर में लगभग  35 दिनों तक तनावपूर्ण माहौल बना रहा और सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ. दंगे के बीच मुख्तार अंसारी जिप्सी कर में हथियार लेकर घूमता हुआ नजर आया था. 

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ी। धीरे-धीरे सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के बाद हालात पर काबू पाया गया.

मऊ दंगा आज भी राज्य के सबसे गंभीर साम्प्रदायिक तनावों में गिना जाता है, जिसने उस समय प्रशासनिक व्यवस्था, सामाजिक तनाव और राजनीतिक परिस्थितियों पर कई सवाल खड़े किए थे.

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