नई दिल्ली: पिछले कई सालों से भारत में मानसून के दौरान अच्छी-खासी बारिश देखने को मिल रही थी, लेकिन इस बार स्थिति उलट हो सकती है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अपने पहले अनुमान में कहा है कि वर्ष 2026 में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रहने की संभावना है. विभाग के अनुसार, जून से सितंबर तक कुल बारिश लंबी अवधि के औसत (LPA) का लगभग 92 प्रतिशत ही रह सकती है. सामान्य औसत 87 सेंटीमीटर माना जाता है, जबकि इस साल कुल 80 सेंटीमीटर के आसपास बारिश होने का अनुमान है.
तीन महीने कमजोर, एक महीने में राहत की उम्मीद: मौसम विभाग का कहना है कि जून, जुलाई और अगस्त में बारिश सामान्य से कम हो सकती है, जबकि सितंबर में स्थिति थोड़ी बेहतर रहने की संभावना है.
अल नीनो बन रहा मुख्य कारण
IMD के महानिदेशक डॉ. एम. महापात्र ने बताया कि इस बार कम बारिश की सबसे बड़ी वजह प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति बनना है. जून के आसपास अल नीनो कमजोर ला नीना को पूरी तरह जगह ले सकता है. अल नीनो आमतौर पर भारतीय मानसून को कमजोर करता है. सितंबर तक हिंद महासागर में पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल (PIOD) बनने की संभावना है.
जब पॉजिटिव IOD होता है तो हिंद महासागर के पश्चिमी हिस्से (अफ्रीका तट) का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म और पूर्वी हिस्सा (इंडोनेशिया के पास) ठंडा रहता है. इससे हवाओं का रुख बदलता है और कुछ हद तक अल नीनो का नकारात्मक असर कम हो सकता है. उत्तरी गोलार्ध (उत्तर अमेरिका, यूरोप आदि) में इस साल जनवरी-मार्च के दौरान बर्फबारी सामान्य से कम हुई है, जो मानसून के लिए थोड़ा अनुकूल संकेत माना जाता है.
हालांकि अल नीनो का प्रभाव अभी भी प्रमुख रहेगा. इससे उत्तर-पश्चिम भारत और मध्य भारत में बारिश सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती है. उत्तर-पूर्व भारत और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में बारिश लगभग सामान्य स्तर पर रहने की उम्मीद है.
कमजोर मानसून की वजह से खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है. खासकर धान, दालें और तिलहन की बुवाई में देरी या कमी आ सकती है, जिसका असर कुल उत्पादन पर पड़ सकता है. मौसम विभाग अपना पहला अनुमान अप्रैल के मध्य में जारी करता है और मई के अंतिम सप्ताह में इसे अपडेट किया जाता है.