हैदराबाद: तेलंगाना में हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी को दिसंबर 1983 में महज 91 दिनों की पैरोल मिली थी. लेकिन वह करीब चार दशक तक जेल से बाहर घूमता रहा. इस दौरान न तो वह अंडरग्राउंड हुआ और न ही विदेश भागा. उल्टा उसने सरकारी शिक्षक की नौकरी हासिल की, साल 2004 में ‘बेस्ट टीचर’ अवॉर्ड जीता और 2013 में आराम से रिटायर भी हो गया. पुलिस को इसकी खबर तक नहीं हुई.
16 मई 2024 को उसकी गिरफ्तारी के लिए बनी स्पेशल टास्क फोर्स को उसकी लोकेशन मिली. तब तक वह 73 साल का हो चुका था. उसे गिरफ्तार कर सेंट्रल जेल वापस भेज दिया गया. जेल लौटने पर उसकी 27 दिनों की जमा छूट (रेमिशन) रद्द कर दी गई और अगले तीन साल तक पैरोल या फर्लो पर रोक लगा दी गई.
इसके खिलाफ उसकी पत्नी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने 40 साल की लंबी देरी, पति की उम्र और खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए मेडिकल पैरोल की मांग की. जस्टिस टी. माधवी देवी ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह कैदी अपने जीवन का सबसे अच्छा समय जेल से बाहर बिताने में सफल रहा. उसने सजा की बात छिपाकर धोखे से सरकारी नौकरी हासिल की और सारे फायदे उठाए.
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि 40 साल तक किसी कैदी का इस तरह गायब रहना और बिना रोक-टोक सरकारी नौकरी करना, बिना गार्ड के पैरोल देने वाले जेल प्रशासन की व्यवस्था की पोल खोलता है. स्वास्थ्य के आधार पर मांगी गई पैरोल को भी कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जेल में इलाज की पूरी सुविधा उपलब्ध है.