एथेनॉल मिले पेट्रोल से गाड़ियां खराब हो रहीं, गडकरी के बेटों की संपत्ति दिन-दुनी रात-चौगुनी बढ़ रही, सोशल मीडिया पर गडकरी को गालियां तक पड़ रही, फिर भी मोदी मौन हैं, मानो ये उनकी सरकार का मामला ही नहीं, तो फिर इस मौन की वजह क्या है, नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह दो ही ऐसे मंत्री हैं, जो 2014 से अब तक मोदी मंत्रालय में डटे हुए हैं, वरना सारे पुराने मंत्रियों का पत्ता साफ हो चुका है...तो गडकरी जो कभी जनता के लिए राजनीतिक हीरो बन गए थे, वो अचानक विलेन कैसे बन गए, इसे समझने के लिए 17 साल पीछे चलना होगा....
17 साल पुराना किस्सा
महाराष्ट्र की राजनीति से नए-नए निकले गडकरी बीजेपी अध्यक्ष बनकर दिल्ली पहुंचे थे, 52 साल की उम्र में बीजेपी के सबसे यंगेस्ट अध्यक्ष की उपाधि इन्हें मिली हुई थी, लेकिन इसी दौरान ये एक ऐसी गलती करते हैं, जो इन्हें मोदी के खिलाफ ले जाकर खड़ा कर देता है, संजय जोशी नाम के नेता जिन्हें मोदी का विरोधी कहा जाता है, उन्हें पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दे देते हैं, जिसे देखकर मोदी तब तो कुछ नहीं बोलते, पर जब RSS की ओर से ये आदेश आता है कि गडकरी को दूसरी बार अध्यक्ष बनाया जाए और इसके लिए बीजेपी के संविधान में संशोधन किया जाए तो मोदी एक शर्त रख देते हैं, वो कहते हैं, मैं समर्थन देने को तैयार हूं, पर इसके लिए संजय जोशी को हटाना होगा. ये गडकरी और मोदी के बीच की पहली ऐसी अनबन थी, जिसने सुर्खियां ज्यादा नहीं बटोरी, पर उसके बाद गडकरी के खिलाफ एजेंडा चलना शुरू हो गया, कहते हैं जैसे-जैसे बीजेपी में गुजरात लॉबी का कद बढ़ता गया, बाकी राज्यों के बड़े-बड़े नेताओं की धमक कम होती चली गई....
गडकरी के खिलाफ पहला आरोप लगता है साल 2012 में, जब महाराष्ट्र में 70 हजार का सिंचाई घोटाला सामने आता है, उस वक्त सरकार एनसीपी-कांग्रेस की थी, अजीत पवार पर गंभीर आरोप थे, लेकिन गडकरी पर पवार को बचाने के आरोप लगे थे.
ये वो दौर था जब बीजेपी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को घेर रही थी, दिल्ली में केजरीवाल ने बिगुल बजा रखा था. उस वक्त गडकरी के शुगर बिजनेस पर भी सवाल उठे, तब सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इन आरोपों को गलत बताया.
लेकिन गडकरी के खिलाफ हवा मजबूत होने लगी थी, नतीजा साल 2013 में इन्हें बीजेपी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा, राजनाथ सिंह बीजेपी के नए अध्यक्ष बनते हैं, और मोदी के नाम का प्रस्ताव वही रखते हैं, पर कहा जाता है गडकरी के इस्तीफे ने आरएसएस के उस सपने पर पानी फेर दिया, जो नागपुर के नेता को उसने दिल्ली के पीएम की कुर्सी पर बिठाने का देखा था....
2014 में गडकरी को मिला बड़ा चैलेंज
साल 2014 के चुनाव में गडकरी को सबसे बड़ा चैलेंज तब मिला, जब उन्हें नागपुर सीट से बीजेपी ने टिकट दे दिया, ये वो सीट थी, जहां बीजेपी की जीत असंभव मानी जा रही थी, क्योंकि यहां कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, पर गडकरी ने अपने पहले लोकसभा चुनाव में 3 लाख वोटों से जीतकर ये बता दिया कि नागपुर में पकड़ कमजोर नहीं हुई है...इसी का नतीजा था कि चाहकर भी इन्हें दिल्ली से साइड नहीं किया जा सका, मोदी सरकार में सड़क परिवहन मंत्रालय की कुर्सी इन्हें मिलती है, और ये अपने काम से ऐसी पहचान बनाते हैं कि एक ही मंत्रालय में बने हुए वो सबसे लंबे कार्यकाल वाले मोदी सरकार के मंत्री बन जाते हैं....
जब सीएम बनते-बनते रह गए गडकरी
लेकिन गडकरी यहां भी खुश नहीं थे, क्योंकि जब महाराष्ट्र के चुनाव होते हैं तो इन्हें उम्मीद थी वहां के सीएम की कुर्सी मिल जाएगी, पर बीजेपी ये समझ चुकी थी कि वहां भेजने का मतलब गडकरी के गढ़ को और मजबूत करना होगा, इसीलिए न दिल्ली में इनके मंत्रालय को बदला गया, और ना ही इन पर कोई खास दबाव बना, बल्कि महाराष्ट्र में इनके सियासी गुरु गंगाधर राव फडणवीस के बेटे देवेन्द्र फडणवीस को सीएम बनाकर इन्हें समझा दिया जाता है...लेकिन इनकी सन ऑफ संघ और हाइवेमैन ऑफ इंडिया वाली छवि अभी भी बरकरार रहती है, कहा ये तक जाता है कि 2024 के चुनाव में जब लगा था कि बीजेपी की सीटें कम आएंगी तो गडकरी को फिर से पीएम कैंडिडेट के रूप में देखा जाने लगा था, लेकिन ये भी संभव नहीं हो पाया...और गडकरी की अब वो कुंडली खुलने लगी है जिसे वो राजनीतिक साजिश बताने लगे हैं...चाहे
उद्घाटन के दो महीने के भीतर ही हाइवे का टूटना हो, या ई20 फ्यूल पर सवाल हो
कारवां मैगजीन में छपे गडकरी परिवार पर बीफ इंडस्ट्री से जुड़े होने के लगे आरोप हों
हर मुद्दे पर गडकरी कई तरफ से घिरने लगे हैं. और इन्हें वो दिन याद आने लगे होंगे जब पहली बार महाराष्ट्र में PWD मंत्री बने, सड़कों का जाल बिछाया, हाइवेमैन का ख्वाब देखा, फिर अटल बिहारी वाजपेयी राज में इन्हें गांव-गांव तक सड़क पहुचाने वाले कमेटी का चेयरमैन बना गया. पर तब और अब में भारी अंतर आ चुका है, अब इनका बनाया ऑल वेदर हाइवे हो या फिर खराब निर्माण वाली कंपनियों को दोबारा कॉन्ट्रैक्ट दिया जाना, सवाल कई काम पर उठने लगे हैं, हर 3 मिनट पर आज हाइवे पर एक मौत हो रही है, करीब 14 हजार ब्लैक स्पॉट हाइवे पर चिन्हित किए गए हैं, जो हादसों को दावत दे रहे हैं...और ऊपर से इनकी बेटों की कंपनियां, ई20 फ्यूल के बाद से ऐसे मालामाल हुई है, मानो अचानक से लॉटरी लग गई हो, जिस आरोप पर गडकरी कहते हैं हमने सीधे तौर पर कोई फायदा नहीं पहुंचाया. पर गडकरी को भी अब सोचना होगा, क्या से क्या हो गए, देखते-देखते...