लखनऊ : उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही सियासी नैरेटिव की लड़ाई तेज होती दिख रही है. बीजेपी जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दों को धार देने की तैयारी में है, वहीं समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव भी अपने राजनीतिक एजेंडे को नए तेवर के साथ आगे बढ़ा रहे हैं.
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के यूपी दौरे के दौरान राम, शिव और कृष्ण का जिक्र इस रणनीति की झलक देता है. उन्होंने उत्तर प्रदेश को भगवान राम, भगवान शिव और भगवान कृष्ण की भूमि बताते हुए पार्टी के सांस्कृतिक एजेंडे को सामने रखा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी यूपी को राम और कृष्ण की पवित्र भूमि बताते हुए उनका स्वागत किया.
राजनीतिक जानकारों की नजर अब खास तौर पर मथुरा पर है. अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद मथुरा का मुद्दा बीजेपी के सांस्कृतिक विमर्श में पहले से ही महत्वपूर्ण रहा है. ऐसे में 2027 से पहले कृष्ण जन्मभूमि का नैरेटिव चुनावी राजनीति में कितना प्रभावी होगा, यह देखने वाली बात होगी.
दूसरी ओर अखिलेश यादव भी बीजेपी के हिंदुत्व नैरेटिव का मुकाबला करने के लिए सनातन और धार्मिक प्रतीकों से दूरी बनाने के बजाय उन्हें अपने तरीके से राजनीतिक विमर्श में शामिल करते नजर आ रहे हैं. इससे यूपी की राजनीति में मुकाबला केवल जातीय समीकरणों और विकास के मुद्दों तक सीमित रहने के बजाय धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द भी घूम सकता है.
2022 में बीजेपी ने 255 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, जबकि समाजवादी पार्टी को 111 सीटें मिली थीं. अब 2027 में दोनों दलों की कोशिश होगी कि वे अपने-अपने सामाजिक समीकरणों के साथ ऐसा नैरेटिव तैयार करें, जो वोटरों के बड़े वर्ग को प्रभावित कर सके.
यानी यूपी की अगली सियासी लड़ाई में राम के बाद कृष्ण, शिव और सनातन का मुद्दा कितना बड़ा चुनावी हथियार बनता है, इस पर सबकी नजर रहेगी.