Ayodhya Ram Mandir : राम मंदिर में हुई चोरी का मसला इतना गंभीर है कि वहां बीजेपी तो छोड़िए कांग्रेस अभी बोलने को तैयार नहीं है. क्या किसी बड़ी मछली को बचाने के लिए छोटी मछली को फंसाया जाएगा. मसला सिर्फ चंदा चोरी और दोषियों तक से आगे जा चुका है. सत्ता के तीन केंद्र हैं, लखनऊ, दिल्ली और नागपुर. बीजेपी के स्वर्णिम युग में ये पहला मामला है जब एक FIR दर्ज होते ही आपस में ये तीनों केंद्र टकरा सकते हैं, यहां योगी आदित्यनाथ पर सबकी नज़रें टिकी हैं. वरिष्ठ पत्रकार दिबांग सूत्रों से दावा करते हैं कि खुलासा होते ही चंपत राय एक FIR करवाने वाले थे. तभी एक फ़ोन कॉल उन्हें जाता है और कहां जाता है कि आप अभी रुकिए, मामले की जांच के बाद हम देखते हैं.
चंपत राय, गोपाल राव, अनिल मिश्र और गोपाल गिरी ये चार नाम हैं जो RSS के करीबी कहे जाते हैं, इनके नीचे टिन्नू यादव, अर्जुन और बाकी के कई किरदार मंदिर में सारा खेल रचते हैं. ये खेल बहुत बड़ा हो सकता है. योगी आदित्यनाथ के लिए एक तरफ़ कुआं और दूसरी तरफ़ खाई जैसे हालात हैं. पिछले दो साल से योगी आदित्यनाथ को आभास था कि कभी ना कभी चंपत राय और उनकी टोली सरकार के दामन पर दाग़ लगा सकती है, कहते हैं ज़मीन घोटाले का जब दावा अखिलेश यादव ने किया था. उस वक्त से ही योगी सजग हो गए थे.
अयोध्या कांड से ही रामायण शुरू होती है और उत्तरकांड तक योगी को ऐसा फैसला करना होगा जो भारतीय राजनीति में एक नज़ीर बने. योगी सब कुछ जानते हैं इसलिए जब वो अयोध्या गए तो वहां दो घटनाएँ गवाह बनी. पहली योगी ने चंपत राय और गैंग को दूर कर दिया. दूसरा योगी ने कहा 500 साल इंतज़ार किया 15 दिन और सब्र कीजिए. सबका हिसाब होगा.
दावा किया जा रहा है कि SIT के मना करने के बाद भी गोपाल राव कर्नाटक पहुंचे, वहां उन्होंने आरएसएस के सरकार्यवाह हौसबोले दत्तात्रेय से मुलाक़ात की. दावा ये भी है कि जो FIR होने वाली है उसमें अनिल मिश्रा, टिन्नू यादव का नाम हो सकता है. गोपाल राव नाम भी FIR में होगा. कहते हैं कि वहां किसी भी दानवीर को कोई पर्ची नहीं दी जाती. यही कारण है कि चांदी को गलाकर मंदिर में यूज़ करने के बजाय सबको शक हो रहा है कि वो कोई लेकर चंपत हो गया.
राम मंदिर का मुद्दा हमेशा से बीजेपी-RSS के टकराव का विषय रहा है. जब राम मंदिर के उद्घाटन का मंच सजा था उस दिन मोहन भागवत और पीएम मोदी का सामूहिक संबोधन करवाया गया, उस दिन लालकृष्ण आडवाणी को नहीं बुलाया गया. गोरखपुर को वो जगह मंच पर नहीं मिली जिसका हक़दार मठ था. पीएम मोदी के जन्म से पहले से ही गोरखपुर मठ श्रीराम जन्मभूमि के लिए संघर्ष करता रहा था. यानि 100 साल तक मठ ने प्रयास किया लेकिन मंदिर निर्माण से लेकर मंदिर की देखरेख तक से योगी को दूर रखा गया.
अब हर फैसला योगी को लेना है. श्रीराम का अपमान कभी भी मठ ने करने नहीं दिया, मठ ने हमेशा रक्षक की तरह राम जन्म भूमि की रक्षा की है, ये बात हवा में नहीं है बल्कि इतिहास की कई किताबें इसका दावा करती हैं. राम मंदिर में हुई लूट कोई बड़ी नहीं है. जो SIT बनी, उसको योगी के आदेश पर बनाया गया है. जिसने शुरुआती जांच रिपोर्ट गृह सचिव संजय प्रसाद को सौंप दी है. जिसे योगी आदित्यनाथ देखेंगे. यानि अब दूध का दूध पानी का पानी करने का फैसला योगी आदित्यनाथ को करना हैं. पिछले 28 साल की सियासत में योगी ने हमेशा सच्चे सनातनी का धर्म निभाया है और उम्मीद है इस बार भी वो ऐसा ही करेंगे.