जो लोग कह रहे हैं यूपी के हिंदू एकजुट नहीं हुए, इसलिए बीजेपी अकेले बहुमत से दूर हो गई. जो ये कह रहे हैं कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने के बाद भी हिंदुओं ने बीजेपी को वोट नहीं दिया, हिंदुओं ने प्रभु राम के साथ भी धोखा कर दिया, जिस पार्टी ने राम मंदिर बनाया उसे सिर्फ 33 सीट और जिनके पिताजी ने रामभक्तों पर गोलियां चलवाई उन्हें ज्यादा सीट मिली, वो लोग रामपुर सीट के एक बूथ की रिपोर्ट सुनकर दंग रह जाएंगे.
ये वही सीट है, जहां से अखिलेश यादव ने मोहिबुल्लाह को प्रत्याशी बनाया था. ये सीट आजम खान का गढ़ मानी जाती है. इसलिए जीत की संभावना पहले से ज्यादा थी. लेकिन रामपुर के एक गांव में जो खेल हुआ, उसने बीजेपी की पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया. प्रोफेसर सुधांशु त्रिवेदी के सोशल मीडिया पर एक पोस्ट मिलता है, जिसमें लिखा है- रामपुर के एक गांव की बूथ पर जहां 100 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, वहां कुल 2322 वोट पड़े, इस गांव में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 532 घर दिए गए. इस पोलिंग बूथ पर बीजेपी को एक भी वोट नहीं मिला.
इसका मतलब ये हुआ कि मोदी-योगी की जोड़ी को हराने के लिए मुस्लिम वोटर्स ने एकमुश्त वोट किया, जबकि हिंदू वोटर्स इस बहकावे में रह गया कि यूपी से बीजेपी तो ज्यादा से ज्यादा सीटें जीत ही रही है, फिर वोट देने बाहर जाऊं या न जाऊं, एक -दो सीटों से क्या फर्क पड़ता है, लेकिन यही एक-दो सीटों ने बीजेपी को बड़ा नुकसान कर दिया. हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक ये भी दावा करते हैं कि यूपी में योगी को नजरअंदाज करना बीजेपी को भारी पड़ गया.
जब लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान भी नहीं हुआ था, तब सीएम योगी ने एक लिस्ट हाईकमान को भेजी थी, जिसमें उनके 30-40 ऐसे करीब नेताओं के नाम थे, जिन्हें टिकट मिलता तो वो यूपी में जीत सकते थे, लेकिन हाईकमान ने उनमें से किसी को भी टिकट नहीं दिया, यहां तक कि योगी को ये तक कहना पड़ा कि हमारे आसपास रहोगे तो शायद टिकट न कट जाए, इसलिए दूर ही रहो. यानि इससे ये साफ है कि टिकट बंटवारे में योगी की राय का ध्यान नहीं रखा गया. और ये बात वोटर्स को इतनी चुभी कि उन्होंने बड़ा नुकसान करवा दिया.
आपको याद होगा जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और दिल्ली से कोई आदेश जाता था, पार्टी हाईकमान कुछ कहता था तो वहां के कई नेता इस बात से नाराज होते थे कि हमारे नेता को फ्री हैंड क्यों नहीं मिल रहा, शुरुआती दौर में हर कोई ये फेज फेस करता है, और फिर उससे बाहर निकलता है, आगे बढ़ता है.
जब आप बड़े पद की ओर बढ़ते हैं तो आपको कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. आज जिस उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे का जाल बिछा है, भव्य काशी कॉरिडोर बना है, शानदार राममंदिर बना है, उस उत्तर प्रदेश का वोटर अगर बीजेपी से नाराज होता है, इन कामों को करने वाली पार्टी को वोट कम देता है, सीटें कम देता है तो फिर सवाल उठते हैं कि आखिर ऐसा कौन सा फैक्टर रह गया, जिसने ऐसा किया. क्या प्रदेश की जनता ये चाहती है कि सांसदजी हमारे यहां जन्मदिन में नहीं आए, हमारी पार्टी में नहीं आए इसलिए हरा देता हूं. अगर जनता को फ्री पसंद है, तो फिर दिल्ली में बीजेपी ने 7 सीटें कैसे जीत ली, ये भी सोचना होगा.
बिहार में सीटें कम हुई, पर बावजूद उसके एनडीए को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ. मतलब जाति में बंटा हुआ बिहार भी इस बार मोदी के साथ दिखा फिर यूपी में ऐसा क्या हुआ कि खेल बदल गया.
अखिलेश और राहुल की जोड़ी ने यूपी में कोई ऐसा अभूतपूर्व काम नहीं किया जिसे देखकर राजनीतिक दिग्गज चुनाव के पहले अनुमान लगा पाते कि कुछ ऐसा होने जा रहा है, खुद राहुल-अखिलेश भी हो सकता है इस बात से हैरान होंगे कि यार इतनी सीटें तो सोची भी नहीं थी. क्या जाति-व्यवस्था के अलावा कोई और फैक्टर यूपी में चला है, जिसे बीजेपी भांप नहीं पाई, या मोदी-शाह की जोड़ी तक ये संदेश पहुंचाने की कोशिश है कि बाबा को इग्नोर करना ठीक नहीं है. क्या योगी की दिल्ली एंट्री का ये सही वक्त है.