लखनऊ : उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर 2027 की जंग जैसे-जैसे करीब आ रही है, सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती अब सीट बंटवारा बनती जा रही है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सपा कांग्रेस को करीब 75 सीटें देने के फॉर्मूले पर विचार कर रही है, जबकि कांग्रेस खेमे की मांग इससे कहीं बड़ी है. कांग्रेस के भीतर बराबरी और सम्मान के आधार पर सीट बंटवारे की आवाज पहले भी उठ चुकी है.
कांग्रेस समर्थकों का तर्क है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन की सफलता में कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण रही. दोनों दलों ने मिलकर 43 सीटें जीती थीं, जिनमें सपा की 37 और कांग्रेस की 6 सीटें शामिल थीं. यही प्रदर्शन कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में ज्यादा हिस्सेदारी मांगने का राजनीतिक आधार देता है.
लेकिन सपा का गणित अलग है. विधानसभा चुनाव लोकसभा से बिल्कुल अलग होता है. 403 सीटों पर संगठन, बूथ नेटवर्क, स्थानीय उम्मीदवार और जातीय समीकरण निर्णायक होते हैं. अखिलेश यादव के लिए ज्यादा सीटें छोड़ना अपने संगठन और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने जैसा हो सकता है. हालिया बयानों में अखिलेश ने 2027 की लड़ाई को मुख्य रूप से सपा और बीजेपी के बीच मुकाबला बताया है, जिससे संकेत मिलता है कि सपा खुद को यूपी में मुख्य विपक्षी ताकत मान रही है.
यही कारण है कि असली लड़ाई संख्या से ज्यादा जीतने वाली सीटों'₹ पर होगी. दोनों दलों के सर्वे भी इसी दिशा में चल रहे हैं. अगर कांग्रेस 200 से कम पर समझौता नहीं करती और सपा 75-80 के आसपास अटकती है, तो टकराव तय है. ऐसे में गेंद सीधे अखिलेश यादव और राहुल गांधी के पाले में होगी.
दोनों नेताओं को 2024 की सफलता बचाते हुए ऐसा फॉर्मूला निकालना होगा, जिसमें सीटों से ज्यादा जीत की संभावना और गठबंधन की एकजुटता मायने रखे.