धीरेंद्र शास्त्री के प्रभारी ने किया बड़ा फर्जीवाड़ा, सरकारी जमीन की करा ली रजिस्ट्री

Amanat Ansari 12 Oct 2025 09:42: PM 3 Mins
धीरेंद्र शास्त्री के प्रभारी ने किया बड़ा फर्जीवाड़ा, सरकारी जमीन की करा ली रजिस्ट्री

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जहां लोक निर्माण विभाग की बहुमूल्य सरकारी संपत्ति को निजी हाथों में धकेल दिया गया. कोतवाली थाना के निकट शक्ति मेडिकल स्टोर से सटे हाउस ऑफ दफ्तरी नामक इस भवन की रजिस्ट्री गलत तरीके से करा ली गई. यह 4000 वर्ग फीट का प्लॉट बाजार मूल्य के लिहाज से करीब 9 करोड़ रुपए का आंका जा रहा है.

रजिस्ट्री दो लोगों धीरेंद्र कुमार गौर और दुर्गेश पटेल के नाम पर हुई. इनमें से धीरेंद्र गौर को बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र शास्त्री का दिल्ली से वृंदावन यात्रा का प्रभारी बताया जा रहा है. इस मामले ने स्थानीय स्तर पर हड़कंप मचा दिया है. घटना की जानकारी मिलते ही कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने फौरन कदम उठाए. उन्होंने लोक निर्माण विभाग के एक्जीक्यूटिव इंजीनियर आशीष भारती को पूरे प्रकरण की तहकीकात सौंपी.

जिला रजिस्ट्रार कार्यालय ने भी लापरवाही पकड़े जाने पर रजिस्ट्री क्लर्क रघुनंदन पाठक का लाइसेंस तुरंत निलंबित कर दिया. इसके अलावा, तत्कालीन सब-रजिस्ट्रार कंसू लाल अहिरवार के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का सुझाव कलेक्टर को भेजा गया, जिसके आधार पर शुक्रवार को उन्हें निलंबित कर दिया गया. कलेक्टर ने एसडीएम अखिल राठौर को विशेष जांच के आदेश दिए, जिन्होंने भवन के नाम ट्रांसफर पर तत्काल रोक लगा दी.

लोक निर्माण विभाग ने अब हाईकोर्ट में चुनौती देने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है. कलेक्टर जैसवाल ने स्पष्ट कहा कि यह संपत्ति पूरी तरह सरकारी है. विभाग हाईकोर्ट के सिंगल बेंच के फैसले को डबल बेंच में अपील करेगा. उन्होंने विभाग की गंभीर उदासीनता पर नाराजगी जताई और जांच समाप्त होने तक किसी भी नामांतरण या आगे की प्रक्रिया पर प्रतिबंध लगाए रखने के निर्देश दिए.

विभागीय रिकॉर्ड के मुताबिक, यह भवन 1978-79 से सरकारी इस्तेमाल के लिए चिह्नित है. इसे भवन पंजी संख्या 64 में 'हाउस ऑफ दफ्तरी वाला' के तौर पर दर्ज किया गया है. सालों से इसका किराया वसूला जा रहा था और यह विभाग की जीवंत संपत्ति सूची में शामिल रहा. फिर भी, 13 जून 2024 को इसकी रजिस्ट्री मात्र 84 लाख 54 हजार रुपये में धीरेंद्र गौर व दुर्गेश पटेल के नाम कर दी गई.

पूरी कार्रवाई नकली कागजातों और गुमराह करने वाली डीकी (डिक्लेरेटरी डीड) पर आधारित थी, जिसमें साफ-साफ साठगांठ की बू आ रही है. यह विवाद करीब 50 साल पुराना है. स्वतंत्रता के बाद यह विंध्य प्रदेश सरकार के जिम्मे था, जो बाद में लोक निर्माण विभाग के दायरे में आ गया. कुछ लोग फर्जी दस्तावेज गढ़कर इसे निजी संपत्ति बताते हुए दरोगा पंडित के नाम पर दावा ठोक दिया.

2004 में लेबर कोर्ट ने विभाग के हक में फैसला दिया, लेकिन 2005 में दावेदारों ने हाईकोर्ट में अपील कर स्टे ऑर्डर हासिल कर लिया. नवंबर 2024 में गलत दस्तावेज दिखाकर कोर्ट से डीकी जारी कराई गई और जून 2025 में रजिस्ट्री भी हो गई. संपत्ति खरीदने वाले धीरेंद्र गौर ने सफाई दी कि यह मुकदमा 1968 से अदालत में लंबित था. लोक निर्माण विभाग ने अपना पक्ष मजबूत करने वाले प्रमाण नहीं पेश किए, इसलिए कोर्ट ने उनके हक में डीकी दी.

उसके बाद नगर पालिका के रिकॉर्ड के सहारे रजिस्ट्री करा ली. हालांकि, प्रशासनिक अफसरों का कहना है कि सिर्फ डीकी से सरकारी संपत्ति का हस्तांतरण संभव नहीं. जब तक विभाग के मालिकाना हक के रिकॉर्ड में बदलाव न हो, रजिस्ट्री को अमान्य ही माना जाएगा. जांच में यह भी उजागर हुआ कि विभाग की ओर से मुकदमे की पैरवी ढीली रही. हाईकोर्ट में नियमित निगरानी नहीं हुई, जिससे निजी पक्ष को फायदा हो गया.

सूत्रों के अनुसार, कुछ अफसरों की सांठगांठ से संपत्ति बचाने का कोई सख्त प्रयास नहीं किया गया. यह भवन नपा और नजूल दोनों के अभिलेखों में लोक निर्माण विभाग के नाम दर्ज है. गुरुवार शाम को विभाग ने भवन परिसर में नोटिस लगाकर चेतावनी दी कि यह संपत्ति आज भी लोक निर्माण और नजूल विभाग के रिकॉर्ड में सरकारी है. किसी निजी व्यक्ति का दावा गैरकानूनी होगा.

एक्जीक्यूटिव इंजीनियर आशीष भारती ने बताया कि वे हाल ही में इस पोस्टिंग पर आए हैं. 6 अक्टूबर को ही कलेक्टर ने जांच की जिम्मेदारी सौंपी है. मामला अभी गहरा रहा, और आगे की कार्रवाई से कई राज खुल सकते हैं.

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