नई दिल्ली: क्या शिवपाल यादव बीजेपी ज्वाइन करने वाले हैं, यूपी विधानसभा में योगी का चच्चु-चच्चु कहकर उनको बोलना, और फिर गृहमंत्री शाह से शिवपाल की सीधी बात होना क्या इशारा करता है. क्या अब भी शिवपाल के दिल में अखिलेश के प्रति कोई टीस है? शिवपाल ने बीजेपी के मंत्री पद वाला ऑफर क्यों ठुकराया, इन सारे सवालों का जवाब भारत समाचार के पॉडकास्ट में शिवपाल यादव ने बड़ी तसल्ली से दिया है. कैसे 2012 के चुनाव के बाद सैफई के एक कमरे में चार लोगों ने बैठकर यूपी का भावी मुख्यमंत्री तय किया.
किस्सा शुरू होता है साल 1975 से. शिवपाल यादव इटावा में किराये का कमरा लेकर रहते थे, पढ़ाई कर रहे थे. उनके भाई मुलायम सिंह यादव विधायक बन चुके थे, ट्रांजिस्टर पर आवाज आती है देश में इमरजेंसी घोषित कर दिया गया है, शिवपाल यादव अपने पड़ोसी कांग्रेस नेता से पूछते हैं ये इमरजेंसी क्या होता है, वो समझाकर जैसे ही इनके पास से जाते हैं तुरंत शिवपाल के घर पुलिस पहुंच जाती है, पूछती है विधायकजी यानि नेताजी मुलायम यादव कहां हैं.
शिवपाल यादव दिमाग लगाते हैं और पुलिस को गलत पता दे देते हैं, जबकि मुलायम सिंह शादी में गए थे, वहां किसी तरह टेलीफोन से उन तक ख़बर पहुंचवाते हैं आपको पुलिस ढूंढ रही है, इमरजेंसी लग गई है. देर रात जब मुलायम घर लौटते हैं शिवपाल उनको कमरे में बंदकर बाहर से ताला लगा देते हैं, ताकि पुलिस पकड़ न पाए, पर गिरफ्तारियां इतनी तेज हो रही थी, बचना मुश्किल था, फिर भी शिवपाल ने इटावा से किसी तरह बाइक का इंतजाम कर उन्हें सैफई पहुंचवा दिया, और जब वहां उन्हें दांत में दर्द हुआ तो स्टेशन की पिछली साइड से एंट्री करवाकर ट्रेन से उन्हें लखनऊ भेजा.
इलाज करवाया फिर वापस लौटे तब गिरफ्तारी दिलवाई. लेकिन शिवपाल कहते हैं उस दौर में जब ये लोग साइकिल से निकलते तो पुलिस दौड़ा लेती थी. उसके बाद दौर बदला, मुलायम सिंह यादव सीएम बने, सपा की पकड़ प्रदेश में मजबूत हुई, पर एक दौर ऐसा भी आया जब साल 2012 में शिवपाल की बात पहली बार सपा में नहीं मानी गई.
शिवपाल कहते हैं, ''जब चुनाव का रिजल्ट आया, मैं, नेताजी, प्रोफेसर रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव एक ही कमरे में थे. मैंने कहा नेताजी आप एक साल के सीएम बनिए, फिर अखिलेश को बनाइएगा. लेकिन रामगोपाल अखिलेश की साइड हो गए, और आखिर में अखिलेश सबसे युवा सीएम बन गए. फिर दूरियां बढ़ने लगी, नेताजी ने साथ बैठाकर सुलह कराना चाहा लेकिन अखिलेश ने न तो फोन उठाया, न जवाब दिया. नेताजी की सलाह पर आखिर में 2018 में मैंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) का गठन किया.''
ये वो दौर था जब यूपी की सत्ता बदल चुकी थी, योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बन चुके थे, और अखिलेश को अपनी गलती का एहसास होने लगा था. इधर शिवपाल के बीजेपी में जाने की अटकलें लगने लगी थी. सीएम योगी तो उनका नाम सदन में लेते ही रहते थे, पर शिवपाल की बात सीधा दिल्ली में हो रही थी, गृहमंत्री अमित शाह ने उन्हें एक प्रस्ताव भी दिया, दिल्ली बुलाया, पर शिवपाल न तो दिल्ली गए, न प्रस्ताव स्वीकार किया, बल्कि वो कहते हैं मंत्री तो पहले भी रह चुका था, तो सवाल है फिर शिवपाल क्या कोई औऱ बड़ी कुर्सी चाहते थे.
जो नहीं मिली तो वापस अखिलेश के पास पहुंच गए, चाचा-भतीजे की दूरियां मिट गई. लेकिन हुआ बेशक कुछ भी शिवपाल के दिल में ये बात जरूर खटकती होगी कि जिस कांग्रेस ने नेताजी को जेल भेजवाया, जिससे उनका कभी छत्तीस का आंकड़ा रहा, आज अखिलेश ने उसी कांग्रेस से हाथ मिला लिया, राहुल के साथ संविधान उठाए घूमते हैं. क्या राजनीति में रिश्ते वक्त के हिसाब से बदलते रहते हैं.