नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ उनके सोशल मीडिया पोस्ट के संबंध में एफआईआर दर्ज करने के लिए गुजरात पुलिस की आलोचना की. इमरान प्रतापगढ़ी की कविता थी, 'ऐ खून के प्यासे बात सुनो. ' सुप्रीम कोर्ट ने मामले के पीछे के तर्क पर सवाल उठाया और संकेत दिया कि वह (पुलिस) कार्यवाही को रद्द कर सकता है.
शीर्ष अदालत ने एफआईआर दर्ज करने पर आपत्ति जताते हुए अधिकारियों से कहा कि संविधान ने 75 वर्षों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बरकरार रखा है. संविधान को अपनाए हुए 75 वर्ष हो चुके हैं और पुलिस को अब तक पता चल जाना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या होती है?
बता दें कि गुजरात के जामनगर में एक सामूहिक विवाह समारोह का वीडियो पोस्ट करने के बाद प्रतापगढ़ी पर 3 जनवरी, 2024 को दुश्मनी को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाने से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था. वीडियो में उन पर फूलों की पंखुड़ियां बरसाई जा रही हैं और बैकग्राउंड में कविता बज रही है. शिकायतकर्ता ने इसे "भड़काऊ" बताया था.
हालांकि, पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा था कि कविता किसी धर्म को निशाना नहीं बनाती है और अहिंसा का संदेश देती है. पीठ ने एफआईआर को रद्द करने की प्रतापगढ़ी की याचिका को खारिज करने के गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले की भी आलोचना की थी. गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ही प्रतापगढ़ी सुप्रीम कोर्ट गए थे.
अदालत ने राज्य के वकील से कहा कि कविता पर अपना दिमाग लगाओ. आखिरकार, रचनात्मकता भी महत्वपूर्ण है. इससे पहले, प्रतापगढ़ी ने तर्क दिया था कि एफआईआर राजनीति से प्रेरित थी और इसका उद्देश्य उत्पीड़न करना था. सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में उन्हें अंतरिम संरक्षण दिया था. वहीं अब सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है.