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1954 Mahakumbh Stampede: कुम्भ मेला, भारत में आयोजित होने वाला सबसे बड़ा मेला है जहां लाखों करोड़ों की भीड़ और श्रद्धा का एक मनमोहक रूप संगम में जा मिलता है, महाकुम्भ में लोग दूर दूर से अपनी आस्था का परिचय देने आते हैं परिवार के कौशल के लिए कामना करते हैं सोचिये जिस महाकुम्भ में लोग आपने परिवार की कुशलता के लिए आ रहे हैं वह आपने परिवार को ही खो दे, उसका कोई परिवार ही न रहे, 12 वर्षों में एक बार आयोजित किया जाने वाला ये मेला पापों के साथ लोगों को ही नाश करने लगे तो क्या ही श्रद्धा रह जाएगी लोगों की.

आज़ादी के बाद का पहला महाकुम्भ

प्रयागराज 1954: 1954 का कुंभ मेला भारतीय इतिहास में एक दुखद और भयानक अध्याय बन गया, जब संगम तट पर एक भयंकर भगदड़ मच गई. यह घटना 3 फरवरी 1954 को, जब लाखों श्रद्धालु मौनी अमावस्या के दिन गंगा, यमुनाजी और सरस्वती के संगम में स्नान के लिए पहुंचे थे. यह कुंभ मेला भारतीय स्वतंत्रता के बाद का पहला कुंभ था, आज़ादी के बाद लोगों में हर्षो उल्लास और इसने देशवासियों की आस्था और विश्वास को एकजुट किया था. लेकिन वहीं इस दिन ने एक काले दिन के रूप में 1954 के महाकुम्भ ने इतिहास में अपनी जगह बना ली.
हुआ यूँ की मौनी अमावस्या के दिन संगम तट पर स्नान करने के लिए लाखों की संख्या में लोग एकत्रित हुए थे. बारिश के कारण पूरा क्षेत्र कीचड़ और फिसलन से भरा हुआ था, और स्थिति पहले ही खतरनाक थी. इसी बीच एक अफवाह फैल गई कि प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू संगम पर आने वाले हैं. इस खबर ने श्रद्धालुओं की भीड़ को उकसाया और एक-दूसरे को धक्का देते हुए लोग पंडित नेहरू को देखने के लिए दौड़ पड़े. जिसके चलते प्रयागराज के संगम तट पर मंगलवार-बुधवार की रात करीब डेढ़ बजे भगदड़ मच गई और 30 से ज्यादा लोगों की मौत और 90 घायल होने की खबर आयी
भारत आज़ादी के बाद पहले महाकुम्भ में भगदड़ मची और 1 हजार लोगों की मौत हुई,, साल 1954, भारत आज़ादी के बाद का पहला कुंभ इलाहाबाद (प्रयागराज) 3 फरवरी को मौनी अमावस्या को लगा , लाखों की तादाद में लोग स्नान के लिए संगम पहुंचे और बारिश की वजह से जमीन ने फिसलन पकड़ा ली थी और हर तरफ कीचड़ और गद्दों में पानी का जमाव था.

सुबह करीबन 8-9 बजे खबर ने आग पकड़ी की प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आ रहे हैं, उन्हें देखने के लिए भीड़ इक्कठा होकर आगे बढ़ने लगी, इतनी भीड़ अपनी तरफ आती देख नागा साधुओं ने तलवार और त्रिशूल पकड़ी और लोगों को मारने दौड़ पड़े उनसे बचने के लिए जब लोग हफर तफरी में भागे तो भगदड़ मच गई. भीड़ बेकाबू हो गई. यह मेला जो पहले श्रद्धा और आस्था का प्रतीक था वह अचानक से भयानक हादसे में बदलने लगा.
भगदड़ की शुरुआत उस समय हुई जब अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था को संभालने की कोशिश की, लेकिन भीड़ को रोकने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किए गए थे. प्रधानमंत्री नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की V.VIP गाड़ियों के गुजरते ही, बिना किसी नियंत्रण के, प्रशासन ने भीड़ को बैरिकेड तोड़ने की अनुमति दे दी जिससे हालत और बेकाबू हो गए और भीड़ को संभालना असंभव हो गया.
लाखों लोग, जो पहले से ही एक दूसरे से सटे हुए थे, अब रास्तों में फंसे हुए थे. इसके अलावा, जैसे ही भीड़ ने बैरिकेड तोड़ा, साधुओं का एक जुलूस दूसरी दिशा से आ रहा था. यह आमने-सामने का मिलाजुला और भारी संघर्ष ने स्थिति को और भी भयानक बना दिया. लोग एक-दूसरे को धकेलते हुए गिरने लगे, और जो गिरा, वह उठ नहीं सका और लोग उनके ऊपर से गुजर गए और बस बचाओ बचाओ की आवाज़ें रह गयी.

फोटोग्राफर एनएन मुखर्जी ने इस भयावह दृश्य को अपनी कैमरे में कैद किया. उनका कहना था कि उन्होंने एक छोटे बच्चे को भी देखा, घबराए हुए लोगों ने उसे कुचल दिया और आगे बढ़ गए. कोई बिजली के तारों पर झूलकर खुद को बचा रहा था उसकी तस्वीर खींचने के चक्कर जब मुखर्जी आगे बड़े तो भगदड़ में गिरे हुए लोगों के ऊपर गिर गाये उनके अखबार के साथी डरे हुए थे कि वह भी हादसे का शिकार तो नहीं हो गए. दोपहर करीब 1 बजे वह दफ्तर पहुंचे , तो अखबार के मालिक ने उन्हें गोद में उठा लिया. वे जोश में चीख पड़े- ‘Nipu has come back alive' नीपू जिंदा लौट आया है.’ तब उन्होंने उनसे कहा कि हादसे के फोटोग्राफ्स भी लेकर आया हूं.
सरकार का कहना था की हादसे में कुछ भिखारी ही मरे हैं. सैकड़ों लोगों के मरने की खबर गलत है. मुखर्जी ने अधिकारियों को हादसे की तस्वीरें दिखाईं, जिसमें महंगे गहने पहनी महिलाएं भी थीं. जो इस बात का तस्दीक कर रही थीं कि अच्छे बैकग्राउंड वाले भी लोग कुचलकर मरे हैं.
राजभवन और महाकुम्भ की तसवीरें
पत्रिका में एक तरफ हादसा और दूसरी तरफ राजभवन में पार्टी की तस्वीर छापी गयी,,, सीनियर जर्नलिस्ट स्नेह मधुर बताते हैं- ‘अस्सी के दशक में दादा मुखर्जी ने मुझे 1954 कुंभ में मची भगदड़ का किस्सा सुनाया था. भगदड़ में सैकड़ों लोग मारे गए थे. आजादी के बाद पहला कुंभ था, सरकार के लिए यह सरकारी मर्यादा का सवाल था.
अखबार में हादसे की खबर और सरकार का खंडन

4 फरवरी 1954 को अमृत बाजार पत्रिका में हादसे की खबर छपी, जिसमें भगदड़ के कारण कई लोगों की मौत की जानकारी दी गई थी. लेकिन उसी दिन अखबार में एक और तस्वीर छपी, जिसमें राजभवन में राष्ट्रपति के स्वागत में एक पार्टी की तस्वीर दिखाई गई थी. इस विरोधाभास को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने यह दावा किया कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है और अखबार में छपी खबर गलत है, जिसका खंडन किया जाना चाहिए. सरकार का दबाव था कि इस हादसे का कोई प्रमाण नहीं है और मीडिया द्वारा इसे गलत तरीके से पेश किया जा रहा है.
फोटोग्राफर एनएन मुखर्जी का संघर्ष
एनएन मुखर्जी, एक सीनियर पत्रकार, जिन्होंने हादसे के बारे में रिपोर्ट की थी, सरकार के दबाव के बावजूद सही तथ्यों को सामने लाने में लगे रहे. उन्होंने कुंभ मेला स्थल पर जाकर शवों को जलते हुए देखा. प्रशासन ने शवों को ढेर करके उसमें आग लगा दी थी और किसी भी पत्रकार या फोटोग्राफर को घटनास्थल पर जाने की अनुमति नहीं दी गई थी.

एक दिन, मुखर्जी ने गांव वाले की वेशभूषा में छिपकर घटनास्थल तक पहुंचने का नाटक किया. उन्होंने पुलिस को बताया कि उन्हें अपनी दादी से मिलने जाना है और इस तरह से उन्हें अनुमति मिली. फिर उन्होंने जलती हुई लाशों की तस्वीर ली, जो अगले दिन अखबार में छपी. इस फोटो ने मीडिया और प्रशासन के बीच और भी विवाद बढ़ा दिया.
मुख्यमंत्री का गुस्सा और रिपोर्टर पर दबाव
जब तस्वीर छपी, तो यूपी के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत गुस्से में आ गए और उन्होंने पत्रकार को गाली देते हुए पूछा, "कहां है वह ह... फोटोग्राफर?" इस विवाद ने पत्रकारिता और प्रशासन के बीच तनाव को और बढ़ा दिया.
उपन्यास और फिल्म का विचार

समरेश बसु, एक प्रसिद्ध बांग्ला लेखक, ने इस हादसे पर आधारित एक उपन्यास "अमृत कुंभ की खोज में" लिखा था, जो 1955 में बांग्ला अखबार 'आनंद बाजार' में प्रकाशित हुआ. इस उपन्यास में कुंभ मेले की भीड़, हादसा और उसकी भयावहता को चित्रित किया गया था.

मशहूर फिल्मकार बिमल रॉय ने इस उपन्यास पर आधारित एक फिल्म बनाने का विचार किया था. गुलजार, जो उस समय उनके सहायक थे, ने इस फिल्म की पटकथा लिखी. हालांकि, फिल्म पर काम टुकड़ों-टुकड़ों में चल रहा था, लेकिन बिमल रॉय की बीमारी के कारण फिल्म पूरी नहीं हो सकी और यह अंततः ठंडे बस्ते में चली गई.
नेहरू का बयान और घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी

कुछ लोगों का कहना था कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू हादसे के दिन कुंभ में मौजूद नहीं थे, जबकि बीबीसी की रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि नेहरू कुंभ हादसे से एक दिन पहले प्रयाग पहुंचे थे और फिर दिल्ली लौट गए थे. हालांकि, खुद नेहरू ने 15 फरवरी 1954 को संसद में यह स्वीकार किया कि वे हादसे के दिन कुंभ में मौजूद थे और उन्होंने वहां से घटना को देखा था. उन्होंने कहा, "मैं किले की बालकनी में खड़ा था और वहां से 40 लाख लोगों की भीड़ को देख रहा था. यह बहुत दुख की बात है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग जुटे थे और फिर इस घटना का सामना करना पड़ा."

1954 का कुंभ मेला एक दुखद घटना के रूप में याद किया जाता है. इस हादसे ने मीडिया, प्रशासन और सरकार के बीच विवादों को जन्म दिया. हालांकि, पत्रकारिता की साहसिकता और संघर्ष ने सत्य को सामने लाया और जनता को इस त्रासदी के बारे में जानकारी दी.