पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस को लेकर एक बार फिर बड़ी चर्चा शुरू हो गई है। टीएमसी सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बयान ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को खुलकर सामने ला दिया है। उनका दावा है कि जनता का भरोसा अब टीएमसी से उठ चुका है और आने वाले समय में पार्टी का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
इसी बीच बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष को लेकर भी नया विवाद सामने आ गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक टीएमसी की ओर से शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने का समर्थन कई विधायकों ने दिया था, लेकिन जांच में चौरंगी विधायक नयना बंदोपाध्याय के हस्ताक्षर पर सवाल खड़े हो गए।
बताया जा रहा है कि शपथ के दौरान किए गए हस्ताक्षर और समर्थन पत्र पर मौजूद साइन मेल नहीं खा रहे थे। इसके बाद मामले की जांच के लिए CID टीम गठित की गई। जब जांच टीम नयना बंदोपाध्याय के घर पहुंची तो वह वहां मौजूद नहीं थीं। बाद में जानकारी मिली कि वह बकरीद के एक कार्यक्रम में गई थीं।
सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि CID अपने साथ हैंडराइटिंग एक्सपर्ट भी लेकर पहुंची थी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं हस्ताक्षर में किसी तरह की हेराफेरी तो नहीं हुई। अब सवाल सिर्फ नेता प्रतिपक्ष का नहीं बल्कि कथित फर्जीवाड़े का बन गया है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर हस्ताक्षर में गड़बड़ी साबित होती है तो यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है। कुछ लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या अन्य दस्तावेजों या रजिस्टरों में भी फर्जी साइन किए गए होंगे।
बंगाल में पहले भी कई बड़े घोटाले चर्चा में रहे हैं। शिक्षक भर्ती घोटाला, शारदा चिटफंड मामला, रोज वैली पोंजी स्कैम और राशन घोटाले जैसे मामलों में कई बड़े नेताओं और मंत्रियों पर कार्रवाई हो चुकी है।
अब बदले राजनीतिक माहौल में तस्वीरें भी अलग दिखाई दे रही हैं। कभी केंद्रीय एजेंसियों के खिलाफ विरोध और हमलों की खबरें आती थीं, लेकिन अब सत्ता बदलने के बाद कानून-व्यवस्था का रुख सख्त दिखाई दे रहा है। कई इलाकों में माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई और राजनीतिक दबाव बढ़ने की चर्चा हो रही है।
इसी बीच टीएमसी के भीतर इस्तीफों और नाराजगी का दौर भी तेज हो गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब सबसे ज्यादा सवाल अभिषेक बनर्जी की रणनीति और नेतृत्व शैली पर उठ रहे हैं। ममता बनर्जी पर भी यह आरोप लग रहा है कि वह भतीजे के मोह में पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी को नियंत्रित नहीं कर पा रही हैं।
बंगाल में जारी जांच, छापेमारी और राजनीतिक उठापटक के बीच अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या टीएमसी अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है।