लखनऊ : उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों वाली सियासत में चुनाव से करीब छह महीने पहले ही तस्वीर बहुकोणीय होती नजर आ रही है. बीजेपी, सपा और कांग्रेस जैसे स्थापित दलों के बीच मुकाबले के साथ अब ऐसे चेहरे और संगठन भी मैदान में उतर रहे हैं, जो अलग सामाजिक, प्रशासनिक या वैचारिक आधार पर अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल, रोहिणी घावरी और पूर्व सीबीआई निदेशक एम. नागेश्वर राव की सक्रियता इसी बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत है.
सबसे दिलचस्प नाम दिव्या मित्तल का है. आईएएस छोड़कर राजनीति में आने का फैसला करने वाली दिव्या ने फिलहाल किसी स्थापित दल का हिस्सा बनने से दूरी बनाई है. उनके पूर्वांचल, खासकर मिर्जापुर या बलिया से चुनावी जमीन तलाशने की चर्चा है. मिर्जापुर में जिलाधिकारी के तौर पर उनका कार्यकाल रहा है, इसलिए पूर्वांचल में उनकी व्यक्तिगत पहचान को राजनीतिक पूंजी में बदलने की कोशिश महत्वपूर्ण होगी.
दूसरी तरफ रोहिणी घावरी दलित राजनीति में नए समीकरण की संभावना पैदा कर रही हैं. उनका फोकस पासी और वाल्मीकि समाज के मुद्दों पर रहने की बात सामने आई है. पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर दलित वोट निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. ऐसे में उनकी सक्रियता का असर सीधे किसी एक दल पर पड़ेगा, यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन मौजूदा दलित राजनीतिक समीकरण में एक नया चेहरा जरूर जुड़ रहा है.
तीसरा बड़ा घटनाक्रम पूर्व सीबीआई निदेशक एम. नागेश्वर राव की सर्वजन सनातन पार्टी है. उन्होंने वाराणसी से राजनीतिक दल के गठन का ऐलान करते हुए यूपी की सभी 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की बात कही है. हालांकि, उन्होंने खुद चुनाव नहीं लड़ने की बात कही है। उनका एजेंडा सनातन, सभ्यतागत पहचान, शिक्षा और चिकित्सा जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द है.
असल सवाल यही है कि ये नए मोर्चे कितने वोट हासिल करेंगे. चुनाव में कई बार छोटी पार्टियां सीट जीतने से ज्यादा वोट काटने और मुकाबले का अंतर बदलने की भूमिका निभाती हैं. यदि ये नए चेहरे किसी खास जातीय, क्षेत्रीय या वैचारिक समूह में पकड़ बनाते हैं, तो करीबी मुकाबले वाली सीटों पर बड़े दलों की रणनीति प्रभावित हो सकती है.
यानी 2027 का यूपी चुनाव सिर्फ बीजेपी बनाम विपक्ष की सीधी लड़ाई नहीं रह सकता. जैसे-जैसे नए चेहरे मैदान में उतरेंगे, असली लड़ाई वोटों के बंटवारे, सामाजिक समीकरण और छोटे मोर्चों के प्रभाव की होगी. यही नए मोर्चे बड़े दलों के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकते हैं.