लखनऊ : कभी यूपी की राजनीति में मेनका गांधी और वरुण गांधी बड़ा नाम थे. पीलीभीत से सुल्तानपुर तक दोनों की अपनी मजबूत सियासी पहचान थी, लेकिन 2024 के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई. यह सिर्फ चुनाव हारने की कहानी नहीं, बल्कि सियासी प्रभाव के धीरे-धीरे सिकुड़ने की कहानी है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक दौर था, जब मेनका गांधी और वरुण गांधी का नाम अलग वजन रखता था.
मेनका गांधी पीलीभीत और बाद में सुल्तानपुर से लगातार चुनाव जीतकर अपनी मजबूत पकड़ साबित करती रहीं, वहीं वरुण गांधी 2009 में पीलीभीत, 2014 में सुल्तानपुर और 2019 में फिर पीलीभीत से सांसद बने, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने दोनों की राजनीतिक तस्वीर बदल दी.
सबसे बड़ा झटका वरुण गांधी को लगा. 2024 में BJP ने उन्हें पीलीभीत से टिकट नहीं दिया. उनकी मां मेनका गांधी ने उस वक्त कहा था कि केंद्र सरकार की नीतियों पर वरुण के आलोचनात्मक रुख की वजह से टिकट कटने की संभावना हो सकती है. मेनका गांधी को सुल्तानपुर से टिकट जरूर मिला, लेकिन वह चुनाव हार गईं. उन्हें रामभुआल निषाद ने 43 फीसदी वोट के साथ हराया, जबकि मेनका को करीब 38.82 फीसदी वोट मिले. यानी 43,174 वोटों के अंतर से उनकी नौवीं लोकसभा पारी रुक गई.
इसके बाद दोनों पहली बार लंबे समय में संसद से बाहर हो गए. वरुण की कहानी हालांकि पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. मार्च 2026 में वह परिवार के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले. इस मुलाकात के बाद BJP में उनकी संभावित वापसी या नई भूमिका को लेकर अटकलें जरूर तेज हुईं, लेकिन अभी कोई औपचारिक जिम्मेदारी सामने नहीं आई है.
असल बदलाव सिर्फ टिकट या चुनावी हार नहीं है. BJP का संगठन अब पहले से ज्यादा केंद्रीय नेतृत्व और मजबूत चुनावी मशीनरी पर आधारित है. ऐसे में स्वतंत्र राजनीतिक पहचान रखने वाले नेताओं के लिए पार्टी के भीतर जगह बनाना पहले जैसा आसान नहीं रहा. वरुण का कभी विकास, गरीबी और किसानों जैसे मुद्दों पर अलग स्वर भी चर्चा में रहा था.
यानी मेनका-वरुण गायब नहीं हुए हैं, लेकिन यूपी की सक्रिय सियासत में उनका पुराना प्रभाव जरूर कमजोर पड़ा है. अब असली सवाल है कि 2027 से पहले वरुण गांधी वापसी करते हैं या यह गांधी परिवार की एक और राजनीतिक विरासत बनकर रह जाती है.