Atiq Ahmed : प्रयागराज का चकिया… कभी यही वो इलाका था, जहां से अतीक अहमद का दबदबा दिखाई देता था. चकिया का पुश्तैनी घर सिर्फ एक मकान नहीं, बल्कि अतीक के रसूख की पहचान माना जाता था. घर के भीतर गैराज था, जहां एक नहीं बल्कि कई गाड़ियां खड़ी रहती थीं. कभी इसी जगह से निकलने वाले काफिलों को देखकर इलाके में अतीक के प्रभाव का अंदाजा लगाया जाता था, लेकिन वक्त ने पूरी तस्वीर बदल दी. आज वही आलीशान मकान जमीनदोज हो चुका है.
दीवारें ढह चुकी हैं, कमरों का नामोनिशान मिट चुका है और जिस जगह कभी आवाजाही रहती थी, वहां अब खामोशी पसरी है. ध्वस्त मकान के पीछे जब पहुंचा गया तो वहां एक लैंड क्रूजर खड़ी दिखाई दी. स्थानीय लोगों का दावा है कि इसी गाड़ी से अतीक अहमद के बच्चे स्कूल जाया करते थे. यानी कभी जिस गाड़ी का इस्तेमाल परिवार के बच्चे स्कूल जाने के लिए करते थे, आज वह उसी उजड़े साम्राज्य की खामोश गवाह बनकर खड़ी दिखाई देती है.
चकिया की दूसरी तस्वीर उस पुश्तैनी घर की है, जबकि तीसरी तस्वीर अतीक के उस भव्य ऑफिस की, जहां कभी लोगों की भीड़ जुटती थी. फैसले होते थे, मुलाकातें होती थीं और दूर-दूर तक अतीक के नाम का असर दिखाई देता था.
अब तस्वीर बिल्कुल उलट है. ऑफिस खंडहर है… घर खंडहर है… गैराज सूना है और कभी अतीक से जुड़े लोगों की आवाजाही वाली जगह पर अब सन्नाटा है. जिस चकिया से कभी पूर्वांचल की सियासत और अपराध की दुनिया में अतीक के प्रभाव की चर्चा होती थी, आज वही चकिया उसके खत्म हो चुके साम्राज्य की कहानी बयां कर रही है. एक दौर था—काफिले निकलते थे, आज वही रास्ते वीरान हैं.