दिल्ली विधानसभा में मिले 'फांसी घर' की क्या है सच्चाई? सिसकने, फुसफुसाने की आती है आवाज?

Amanat Ansari 07 Aug 2025 07:06: PM 4 Mins
दिल्ली विधानसभा में मिले 'फांसी घर' की क्या है सच्चाई? सिसकने, फुसफुसाने की आती है आवाज?

नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा भवन के इर्द-गिर्द विवाद एक फांसी के फंदे की तरह लटक रहा है. चल रहे मानसून सत्र में लगातार दो दिनों तक सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी आम आदमी पार्टी (आप) के बीच एक गुप्त सुरंग और दो रहस्यमयी कक्षों को लेकर तीखी नोकझोंक देखने को मिली. बुधवार को विवाद इतना बढ़ गया कि पूर्व मुख्यमंत्री और आप नेता आतिशी सहित अन्य विधायकों को सदन से बाहर निकाला गया. ये रहस्यमयी कक्ष और गुप्त सुरंग वास्तव में क्या हैं? यह विवाद क्या है और पुरातत्वविदों व इतिहासकारों का इस बारे में क्या कहना है?

दिल्ली की भाजपा सरकार ने पूर्व आप सरकार के उस दावे को खारिज कर दिया है कि विधानसभा के नीचे स्थित कक्ष कभी लाल किले से जुड़े फांसीघर थे. भाजपा का कहना है कि यह स्थान ब्रिटिश राज के दौरान टिफिन पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होने वाली सेवा सीढ़ी मात्र था. तो, क्या ये दो कक्ष वाकई फांसीघर थे, और क्या सुरंग सचमुच लाल किले तक जाती थी? क्या दिल्ली विधानसभा भवन का अतीत डरावना है? इतिहासकार और पुरातत्वविद इस दावे को खारिज करते हैं.

दिल्ली विधानसभा का 'फांसीघर' कैसे चर्चा में आया?

2021 में आप शासन के दौरान तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राम निवास गोयल ने दावा किया था कि विधानसभा के नीचे के कक्ष ब्रिटिश शासन के दौरान फांसीघर के रूप में इस्तेमाल होते थे. उनके अनुसार, भूमिगत सुरंग लाल किले से जुड़ी थी और संभवतः ब्रिटिश लोग इसे मृत्युदंड प्राप्त कैदियों को फांसी देने के लिए ले जाने में इस्तेमाल करते थे. गोयल ने मीडिया को सुरंग का प्रवेश द्वार दिखाया और इसके इतिहास और संभावित उपयोग के बारे में दावे किए.

उन्होंने 2021 में कहा, "सुरंग विधानसभा को लाल किले से जोड़ती है." हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि आधुनिक निर्माण के कारण सुरंग का रास्ता अवरुद्ध हो गया है. गोयल ने कहा था, "सुरंग और फांसीघर (फांसी का मैदान) को 26 जनवरी 2022 या अगले स्वतंत्रता दिवस तक पर्यटकों के लिए खोल दिया जाएगा." 2002 में, इन कक्षों को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए नवीनीकृत किया गया था, जिसमें स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें दीवारों पर लगाई गई थीं.

भाजपा सरकार का दावा

हालांकि, अब नई भाजपा सरकार ने इन दावों को ऐतिहासिक रूप से आधारहीन करार दिया है. उनके अनुसार, यह स्थान मूल रूप से टिफिन पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होने वाली सेवा सीढ़ी थी, न कि कैदियों के लिए. सीएम रेखा गुप्ता ने बुधवार को दावा किया कि केजरीवाल सरकार ने कक्षों को जेल जैसा बनाने के लिए 1 करोड़ रुपये खर्च किए, जिसमें प्रतीकात्मक जेल की सलाखें लगाई गईं, कुछ फंदे रखे गए, और स्वतंत्रता सेनानियों के भित्ति चित्र स्थापित किए गए. उन्होंने इसे "इतिहास का घोर विकृतिकरण, शहीदों का अपमान, और जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात" बताया.

मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सदन को संबोधित करते हुए रेखा गुप्ता ने संरचना को ध्वस्त करने, औपचारिक जांच शुरू करने, और एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया. भाजपा मंत्री कपिल मिश्रा ने आप सरकार पर "इतिहास के साथ छेड़छाड़" का आरोप लगाया और कहा कि उन्होंने एक झूठा आख्यान प्रस्तुत किया. हालांकि, पूर्व स्पीकर गोयल ने फांसीघर कक्ष और सुरंग के अपने दावों को बरकरार रखा और कहा कि उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को तीन बार पत्र लिखकर इन संरचनाओं की जांच करने का अनुरोध किया था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

क्या कहते हैं इतिहासकार और पुरातत्वविद

ये सारे आरोप-प्रत्यारोप राजनेता दो कक्षों और सुरंग को लेकर कर रहे हैं. लेकिन इतिहास, पुरातत्व, और धरोहर के क्षेत्र के विशेषज्ञों का इस बारे में क्या कहना है? विधानसभा भवन, जो उत्तरी दिल्ली रिज के पास स्थित है, 1912 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत केंद्रीय विधायी सभा के रूप में बनाया गया था. 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, यह 1950 तक संसद भवन के रूप में कार्य करता रहा. बाद में, 1990 के दशक में दिल्ली को एक विधायी निकाय के साथ केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद इसे दिल्ली विधानसभा के लिए उपयोग किया गया.

दिल्ली की मध्यकालीन इतिहास पर कई किताबें लिख चुकीं इतिहासकार राना साफवी ने 2021 में स्पीकर के दावों का खंडन किया था. उन्होंने मीडिया को बताया, "दिल्ली विधानसभा भवन 1912 में बनाया गया था, और यह बहुत असंभाव्य है कि इसमें कोई सुरंग हो जो इसे लाल किले से जोड़ती हो." साफवी, जिनकी 2016 की प्रशंसित किताब 'द फॉरगॉटन सिटीज ऑफ दिल्ली' है, ने कहा, "लाल किला 1639 और 1648 के बीच बनाया गया था. वहां होने वाली कोई भी निर्माण गतिविधि, जिसमें सुरंगें शामिल हों, इसके पहले 100-200 वर्षों में हुई होगी. इसलिए, जो सुरंग मिली है, वह किसी अन्य उपयोग के लिए रही होगी और बहुत छोटी होगी. यह लाल किले तक नहीं जा सकती."

इतिहासकार और लेखक सोहैल हाशमी ने कहा कि यह "बेहद असंभाव्य" है कि विधायी परिषद ने न्यायाधीश और जल्लाद दोनों की भूमिका निभाई हो और अपने परिसर में नियमित रूप से फांसी दी हो. हाशमी ने मीडिया को बताया, "मुझे लगता है कि वर्तमान दिल्ली विधानसभा में फांसीघर की कहानी केवल एक काल्पनिक कथा से ज्यादा कुछ नहीं है." दिल्ली पुरातत्व विभाग के एक अधिकारी ने अखबार को बताया कि उसने न तो फांसीघर या सुरंग के दावों की जांच की है और न ही किसी सरकार ने उसे ऐसा करने के लिए कहा है.

हालांकि केजरीवाल सरकार ने फांसीघर के अस्तित्व की घोषणा की थी, लेकिन जनता को कोई समर्थनकारी साक्ष्य नहीं दिया, इसलिए दावे सट्टेबाजी पर आधारित हैं और इन पर सवाल उठाए जा रहे हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण या दिल्ली राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा पूरी जांच अभी बाकी है. केवल इसके बाद ही कथित फांसीघर और गुप्त सुरंग की सच्चाई स्पष्ट रूप से स्थापित हो पाएगी.

Delhi Assembly phansi ghar delhi aap delhi cm rekha gupta delhi government

Recent News