Islamabad US-Iran Peace Talks: अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में 21 घंटे तक हुई वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई. दोनों पक्षों के बीच शांति स्थापित करने का प्रयास असफल रहा. ये पांच प्रमुख वजहें थीं जिनकी वजह से बातचीत टूट गई...
1. दोनों पक्ष अपनी-अपनी सख्त शर्तों पर अड़े रहे
अमेरिका ने मांग की कि ईरान अपना यूरेनियम संवर्धन (Uranium enrichment) पूरी तरह बंद कर दे और भविष्य में कभी भी परमाणु हथियार न बनाने की गारंटी दे. ईरान ने इसे साफ इनकार कर दिया और कहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा के लिए है. ईरानी पक्ष ने अमेरिकी मांगों को अत्यधिक और अव्यावहारिक बताया, जबकि अमेरिका का कहना था कि वो काफी लचीला था. दोनों तरफ से कोई समझौता करने की इच्छा नहीं दिखी, जिससे वार्ता आगे नहीं बढ़ सकी.
2. ट्रंप की धमकियों ने माहौल खराब कर दिया
वार्ता के दौरान भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लगातार कड़ी चेतावनियां दीं. उन्होंने कहा कि अगर डील नहीं हुई तो हमला और तेज किया जाएगा. ऐसे में ईरान को लगा कि ये बातचीत नहीं, बल्कि दबाव बनाने की रणनीति है. शांतिपूर्ण माहौल की बजाय तनाव और अविश्वास का माहौल बना रहा, जिसने समझौते की संभावना को और कमजोर कर दिया.
3. इजरायल के लेबनान हमलों ने बात बिगाड़ी
वार्ता चल रही थी, उसी दौरान इजरायल ने लेबनान (हिजबुल्लाह नियंत्रित क्षेत्र) में हमले जारी रखे. ईरान ने इसे तुरंत रोकने की मांग की, लेकिन इजरायल ने साफ़ कहा कि अमेरिका-ईरान के बीच का Ceasefire उस पर लागू नहीं होता. पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के इजरायल विरोधी बयान और इजरायल की तरफ से पाकिस्तान को अविश्वसनीय मध्यस्थ बताने से स्थिति और बिगड़ी. ईरान चाहता था कि पूरे क्षेत्र में तनाव कम हो, लेकिन अमेरिका इस पर कोई ठोस आश्वासन नहीं दे सका.
4. होर्मुज जलडमरूमध्य पर गहरी असहमति
ईरान ने फरवरी 28 से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लगभग बंद कर रखा था, जिससे दुनिया भर में तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही थी. अमेरिका इसे तुरंत खुलवाना चाहता था और इसे अपनी अनिवार्य मांग बताता था. दूसरी तरफ ईरान इसे अपनी मजबूत पोजीशन मानता था. वो चाहता था कि पहले प्रतिबंध हटाए जाएं और सुरक्षा गारंटी दी जाए. हॉर्मुज को खोलने, टोल वसूलने और नियंत्रण के मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी, जो डील टूटने का बड़ा कारण बना.
5. गहरे अविश्वास ने समझौते की राह बंद कर दी
दोनों देशों के बीच 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से चला आ रहा गहराअविश्वास सबसे बड़ी बाधा था. ईरान के लिए पिछले अनुभव ये साबित करते थे कि अमेरिका की बातचीत अक्सर हमले की तैयारी का बहाना बन जाती है. अमेरिका की तरफ से दी गई अंतिम और सबसे अच्छी पेशकश को ईरान ने एकतरफा और फंदा जैसा मान लिया. न तो ईरान अमेरिका पर भरोसा कर सका, न ही अमेरिका ईरान की मंशा पर. नतीजा ये हुआ कि कोई भी पक्ष जरूरी रियायत देने को तैयार नहीं हुआ.