इस्लामाबाद: अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शांति वार्ता हुई थी. यह बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई. यह घटना इसलिए खास मानी जा रही है क्योंकि साल 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच सीधे बातचीत का यह पहला मौका था. लगभग 21 घंटे तक चली इस बैठक में कोई समझौता नहीं हो सका. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका ने अपना सबसे अच्छा और आखिरी प्रस्ताव रख दिया है.
उन्होंने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि अब फैसला ईरान को करना है. वेंस का दावा है कि अमेरिका काफी लचीला रवैया अपनाने को तैयार था, लेकिन ईरान अपनी कुछ अड़ियल शर्तों पर अड़ा रहा. दूसरी तरफ, ईरान ने बातचीत के टूटने की सारी जिम्मेदारी अमेरिका पर डाली है. ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका ने बहुत ज्यादा और अनुचित मांगें रखीं, जिन्हें स्वीकार करना असंभव था.
मुख्य मुद्दे जहां बात अटक गई...
ईरान की मांगें क्या-क्या है...
ईरान का कहना है कि वह परमाणु बम नहीं बनाना चाहता, सिर्फ शांतिपूर्ण ऊर्जा कार्यक्रम चलाना चाहता है. फिर भी वह यूरेनियम संवर्धन का अपना अधिकार पूरी तरह छोड़ने को तैयार नहीं है. ईरान ने साफ कहा कि होर्मुज स्ट्रेट पर उसका रुख तब तक नहीं बदलेगा जब तक कोई उचित समझौता नहीं होता. ईरान किसी भी तरह की जल्दबाजी में नहीं है.
अमेरिका का पक्ष जान लीजिए...
जेडी वेंस ने कहा कि कुछ छोटे मुद्दों पर तो सहमति बन गई थी, लेकिन बड़े और महत्वपूर्ण मुद्दों पर कोई आम सहमति नहीं बन पाई. उन्होंने यह भी कहा कि इस समझौते के फेल होने से ईरान को अमेरिका से ज्यादा नुकसान होगा. अब सवाल यह है कि आगे क्या होगा. क्या ईरान कोई नया कदम उठाएगा या ट्रंप प्रशासन फिर से सख्त रुख अपनाएगा. पूरी दुनिया इस बढ़ते तनाव को लेकर चिंतित है.