कोलकाता: पश्चिम बंगाल के हलिशहर नगर पालिका में 16 तृणमूल कांग्रेस के पार्षदों ने बर्रकपुर सब-डिविजनल कार्यालय में सामूहिक इस्तीफा दे दिया, जिससे राज्य भर के नागरिक निकायों में नई अस्थिरता पैदा हो गई है. सूत्रों के अनुसार, हाल के चुनावी झटके के बाद स्थानीय नेतृत्व में बढ़ती नाराजगी के चलते इन पार्षदों ने सामूहिक इस्तीफा दिया.
इस्तीफा देने वाले सदस्यों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र के सांसद पार्थ भौमिक समेत वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव हारने के बाद उनसे संपर्क नहीं किया और उनकी शिकायतों का समाधान नहीं किया. यह सामूहिक इस्तीफा पड़ोसी कांचड़ापाड़ा नगर पालिका में हुई इसी तरह की घटना के तुरंत बाद आया है, जिससे बर्रकपुर सब-डिविजन में तृणमूल कांग्रेस की स्थानीय संरचना में बढ़ती दरारों को लेकर चिंता बढ़ गई है.
इस्तीफा देने वाले 16 पार्षदों में पांच महिला पार्षद भी शामिल हैं. हालांकि, हलिशहर नगर पालिका के चेयरपर्सन शुभंकर घोष इस समूह में शामिल नहीं हुए और अपने पद पर बने हुए हैं, जिससे नगर प्रशासन में भी विभाजन स्पष्ट हो गया है. इस्तीफा देने वाले पार्षदों की सूची बीजपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक सुदीप्ता दास द्वारा जारी की गई, जिनके अंतर्गत हलिशहर आता है. अचानक आए इस राजनीतिक उथल-पुथल और प्रशासनिक अनिश्चितता के बावजूद, सुदीप्ता दास ने निवासियों को आश्वासन दिया कि सार्वजनिक सेवाएं प्रभावित नहीं होंगी.
विधायक ने कहा कि मैं जनता को आश्वस्त करना चाहता हूं कि नगर पालिका की सेवाएं प्रभावित नहीं होंगी. इन बदलावों के बावजूद नागरिकों के लिए सामान्य सेवाएं पूरी तरह से जारी रहेंगी. यह माना जा रहा है कि 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद नगर पालिका नेतृत्व के कुछ हिस्सों में नाराजगी लगातार बढ़ रही थी. कई पार्षदों ने सक्रिय नेतृत्व की कमी और नागरिक प्रशासन से जुड़ी समस्याओं को लेकर चिंता जताई थी.
सूत्रों का कहना है कि हाल ही में सुदीप्ता दास ने नगर पालिका अधिकारियों के साथ चर्चा भी की थी. ट्रिनमूल कांग्रेस के पार्षदों की यह सामूहिक इस्तीफा का फैसला रविवार को कल्याणी में हुई बैठक के दौरान लिया गया. इन इस्तीफों ने स्थानीय स्तर पर आंतरिक कलह और घास की जड़ स्तर के नेताओं में असंतोष को लेकर अटकलों को हवा दी है, खासकर क्षेत्र में हाल के चुनावी प्रदर्शन के बाद.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना बर्रकपुर क्षेत्र में आने वाले नगर और विधानसभा चुनावों से पहले स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक समीकरणों पर गहरा असर डाल सकती है. इस्तीफों से उत्पन्न अचानक खालीपन ने सत्ताधारी नेतृत्व पर असंतोष को नियंत्रित करने और संगठनात्मक एकता बहाल करने का दबाव बढ़ा दिया है.