नई दिल्ली: ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर अपने तीखे और आक्रामक तेवरों से सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। एक जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने दो टूक शब्दों में कहा कि वे किसी भी व्यवस्था से पहले अपने धार्मिक उसूलों को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने विवादित टिप्पणी करते हुए कहा कि मुसलमान कुरान और सुन्नत की पैरवी करने वाले लोग हैं और अगर कोई व्यवस्था उनके मजहबी अधिकारों के आड़े आती है, तो वे ऐसी समानता (इक्वलिटी) को ठोकर मारते हैं।
'हमारे लिए कुरान और सुन्नत सबसे पहले'
ओवैसी ने जनसभा को संबोधित करते हुए शरीयत और धार्मिक पहचान के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि उनके जीवन और आचरण का आधार केवल पवित्र कुरान और पैगंबर की सुन्नत हैं। ओवैसी ने दो टूक लहजे में कहा, "हम कुरान और सुन्नत की पैरवी करने वाले लोग हैं। अगर समानता के नाम पर हमारी धार्मिक पहचान और उसूलों से समझौता करने को कहा जाएगा, तो हम ऐसी इक्वलिटी को ठोकर मारते हैं।"
समान नागरिक संहिता (UCC) पर सीधा प्रहार
ओवैसी के इस बयान को सीधे तौर पर समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) और पर्सनल लॉ में बदलाव की कोशिशों के विरोध के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने मंच से साफ संकेत दिया कि मुस्लिम समुदाय अपने निजी कानूनों और धार्मिक परंपराओं में किसी भी तरह का दखल बर्दाश्त नहीं करेगा। उनका कहना था कि संविधान द्वारा दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत उन्हें अपने उसूलों पर जीने की पूरी आजादी है।
सियासी गलियारों में बयान पर संग्राम तय
ओवैसी की इस टिप्पणी के सामने आने के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। संविधान विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों के बीच इस बात को लेकर बहस तेज हो गई है कि क्या समानता के संवैधानिक सिद्धांत से ऊपर किसी धार्मिक विधान को रखा जा सकता है। विपक्षी और सत्ताधारी दलों की ओर से ओवैसी के इस रुख को ध्रुवीकरण की राजनीति करार दिया जा रहा है।