नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के राहत शिविरों में हो रही संदिग्ध मौतों और यौन उत्पीड़न के मामलों पर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने गहरी चिंता जताते हुए मुख्य सचिव को सभी मामलों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया. जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए पीठ ने शिविरों में रह रहे विस्थापितों की सुरक्षा और सम्मान पर गंभीर सवाल उठाए.
CJI की नाराजगी
राज्य सरकार की ओर से जानकारी देने में ढिलाई पर नाराजगी जताते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा, ''अपने मुख्य सचिव से कहें कि वह अदालत को सख्त आदेश पारित करने के लिए मजबूर न करें. हमें बताएं कि अब तक क्या कदम उठाए गए हैं.'' अदालत को बताया गया कि मणिपुर के आठ जिलों के राहत शिविरों में कुल 640 मौतें दर्ज की गई हैं. इनमें से केवल 20 मामलों में ही पोस्टमार्टम कराया गया. कई मामलों में सिर्फ 20 से 30 हजार रुपये का मामूली मुआवजा दिए जाने पर भी अदालत ने सरकार से जवाब मांगा.
रिपोर्ट में बताया गया था कि राहत शिविरों में 30 से ज्यादा मौतें हुई हैं और इनमें से एक मौत कथित तौर पर यौन उत्पीड़न के बाद हुई थी. सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि हिंसा से जुड़े मामलों की जांच के लिए 8 जिलों में 42 एसआईटी का गठन किया गया है. 3020 मामलों की जांच जारी है. इनमें 302 मामलों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, जबकि 1583 मामलों में क्लोजर रिपोर्ट सौंपी गई है.
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मणिपुर स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (MSLSA) को निर्देश दिया कि प्राथमिकी पर शीघ्र जांच सुनिश्चित की जाए और राहत शिविरों में रहने वाले आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (IDPs) की सुरक्षा व गरिमा बनाए रखी जाए. पीठ ने उम्मीद जताई कि 2023 की जातीय हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए बनाई गई दो विशेष निचली अदालतें (जिनकी जांच CBI और NIA कर रही हैं) जल्द ही अपनी कार्यवाही पूरी करेंगी.