नई दिल्ली: 3 जून 2025 का वो दिन दीपक गुप्ता के लिए काला था. मोहनलालगंज का रहने वाला दीपक, जो पड़ोस में रहने वाली दलित युवती रिंकी से पांच साल पुराने रिश्ते में था, अचानक रेप और SC-ST एक्ट के आरोपों में फंस गया. रिंकी ने शिकायत की कि दीपक ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, फिर किसी और से शादी कर धोखा दिया. दीपक की ज़िंदगी उलट-पुलट हो गई – जेल की हवा खाई, परिवार टूटा, समाज में सिर झुक गया. लेकिन अब कोर्ट ने जो फैसला सुनाया, उसने पूरी कहानी पलट दी. रिंकी ही असल में फंस गई.
जांच के दौरान रिंकी के ही बयानों ने उलझन बढ़ाई. शिकायत के वक्त उसने मेडिकल टेस्ट से साफ इंकार कर दिया. कोर्ट ने उसे बुलाया, तो वह अपनी ही बातों में उलझती चली गई. तत्कालीन ACP रजनीश वर्मा के चार्जशीट से पहले ही कोर्ट ने मामले को संज्ञान में ले लिया. सामने आया कि जिस तारीख का हवाला देकर रिंकी ने रेप का आरोप लगाया, उस दिन दीपक तो कहीं और था. कोई घटना हुई ही नहीं. बस, ये साफ हो गया कि रिंकी ने बदले की आग में झूठा केस गढ़ा था.
रहस्य खुला तो और गहरा. दीपक की शादी की खबर सुनकर रिंकी बौखला गई. पुराना रिश्ता टूटा, तो गुस्से में उसने दीपक को नेस्तनाबूद करने की ठानी. शादीशुदा ज़िंदगी बर्बाद करने के चक्कर में SC-ST एक्ट का दुरुपयोग किया. कोर्ट ने इसे साजिश करार दिया.
अब रिंकी को उसी काले कानून के तहत सजा मिली. SC-ST एक्ट के विशेष जज ने उसे झूठे केस के लिए 3 साल की कठोर कैद ठोकी, साथ ही 30 हजार का जुर्माना लगाया. फैसले में साफ लिखा – आधा जुर्माना दीपक को मुआवजे के तौर पर जाएगा. विशेष लोक अभियोजक अरविंद मिश्रा ने बताया, “कोर्ट ने कहा कि रिंकी ने जानबूझकर दीपक को जेल भिजवाने की कोशिश की. एक्ट का गलत फायदा उठाया. अगर उसे सरकारी सहायता मिली है, तो वो तुरंत वापस हो.”
ये फैसला लखनऊ की सियासत और समाज में चर्चा का विषय बन गया. एक तरफ झूठे आरोपों से बर्बाद हुए दीपक को इंसाफ मिला, दूसरी तरफ रिंकी की साजिश उजागर हो गई. ऐसे केसों से कानून के दुरुपयोग पर सवाल उठ रहे हैं – क्या इंसाफ सबके लिए बराबर?