संपेरे ने नागिन को नाथा, 'खेला हो गेलो'

Global Bharat 14 Jun 2026 10:58: PM 4 Mins
संपेरे ने नागिन को नाथा, 'खेला हो गेलो'

जोड़ा बना सके, इसीलिए कुमारी रह गई थी वह. जब ऊर्जा का उद्रेक होता था, वो नागिन लोकनायक की कार के बोनट पर चढ़ कर नाचने लगती थी, तो कभी मुंशी साधने चलते तो दीपा को ही बुझा देती थी. अटल जैसे कुमार ब्रह्मचारी भी जब इस इच्छाधारी नागिन को साधने के लिए उसकी मां से मिले, तो उनके सीने पर सवार हो कर रेल पर चढ़ बैठी. कभी तिरंगे पर आसीन वह नागिन जब तृणमूल में घुसी, तो उसकी अदृश्य शक्ति और सत्ता के सामने बड़े बड़े पानी मांगने लायक भी नहीं बचे.

ऐसे में ही एक संपेरे ने चुनौती दी कि मैं इस इच्छाधारी नागिन का विषदंत तोड़ कर दिखाऊंगा, फण कुचल कर रख दूंगा. तब नागिन ने मजाक उड़ाया था उस संपेरे का कि मैंने तो नाम भी नहीं सुना है इसका! कौन है यह संपेरा? वैसे तो संपेरा चाहता तो अपनी मंत्र शक्ति की राष्ट्रपतीय शक्ति का प्रयोग कर क्षण भर में नागिन को भस्म कर सकता था, परंतु संपेरे की भी जिद्द थी कि वह लेवल प्लेईंग फिल्ड प्रदान करेगा और नागिन के साथ खेलेगा, खेलायेगा, थकायेगा और जब नागिन थक कर चूर हो जायेगी तो किसी निर्जीव रस्सी की भांति उसे कचरे के कूड़ेदान में पटक देगा.

संपेरे ने बीन बजाया तो सुर निकला सीबीआई का और नागिन ने झपटा मार कर दंश मारा 

तो उसका फण टकराया पथरीली जमीन से और वह अपना एक विषदंत खो चुकी थी. संपेरे ने जब दूसरी बार एनआईए की धुन में बीन बजाई, तो नागिन ने फिर फण पटका परंतु विषस्राव होने पूर्व ही वह अपना दूसरा विषदंत खो चुकी थी.

तीसरी बार संपेरे ने जब ईडी की धुन में बीन बजाया तो नागिन को कुछ कुछ खेल समझ में आने लगा था और ‘खेला होबे के सुर में फुंफकारने वाली नागिन छुप कर दंश मारने की बजाय फ्रंट फुट कर खेलने आ गई और अपने हरे रंग के जेहादी लिबास वाले फाइल को ले भागने में गनीमत समझी.

परंतु संपेरे को पाताल लोक तक डेरा जमाये नागिन के अंडज संपोलों की शक्ति की थाह लग गई थी और संपेरे ने तय किया कि सहस्त्र फणधारी संपोलों के फण सहित नागिन के फण पर समवेत उसी प्रकार नृत्य करना पड़ेगा, जैसे कभी कन्हैया ने कालिय नाग के फण पर किया था.

जैसे कन्हैया कंदुक के बहाने यमुना में छलांग लगाये थे, वैसे ही लोकतंत्र के इस संपरे ने एसआईआर की बीन बजाई और सीएपीएफ के सहस्त्र पद धारण कर इच्छाधारी नागिन और उसके संपोलों का हजार फणों पर समवेत नृत्य करने लगा. जब संपेरे का नृत्य थमा तो लगा कि जैसे यह इच्छाधारी नागिन और इसके संपोले जैसे रबड़ के खिलौने हों और जनता सड़े अंडे और टमाटर से उनका इस्तकबाल करने लगी उनके कुर्ता पाजामा उतार कर चड्ढी बनयान में दौड़ा दिया.

नागिन ,साधारण नागिन नहीं थी! इच्छाधारी नागिन थी वह. वामपंथी नागों को पराजित किया था, उसने परंतु वामपंथियों की दुलारी थी, लिबरलों की प्यारी थी, सेक्युलरों की सुकुमारी थी, जेहादियों की कुमारी थी. संसार में ऐसा कोई नाग पैदा ही नहीं हुआ था जिससे वो जोड़ा बना सके.  

संपेरा के पास मंत्र था श्यामा का, काली का सम्बल था नरेंद्र का, ध्वज था सनातन का, विवेक था रामकृष्ण का तो धैर्य था सेतुबंध करने वाले श्रीराम का और उद्घोष था जय श्रीराम का. नागिन तो सुहरावर्दी का विष ले कर नाच रही थी, लेकिन संपेरा गांधी का चेला नहीं था उसका कलेजा गोपाल पाठा का था. वह लीगी महामाया के वशीभूत जोगेन्द्र मंडल का पढ़ा हुआ पाठ भूलने को तैयार नहीं था. वह उस गुरु का चेला नहीं था जो नोआखाली में अपनी महिला चेलियों को जेहादी बलात्कारियों से बचाने के पोटासियम सायनाइड का ताबीज पहना कर सत्याग्रह की फैंटेसी रचे और पाठा की धार कुंद कर जेहादियों को बचाने की सुहरावर्दी की कूट रचना का शिकार बने. वह भारत विभाजन बचाने की विफल मंत्र पर भरोसा करने की बजाय पश्चिम बंगाल और कोलकाता बचाने की श्यामा मंत्र का सफल साधक था. वह राम जैसा धनुर्धर था, तो कृष्ण जैसा मुरलीधर भी. वह मुरली बजा कर जनमानस पर छा जाना जानता था, तो बंदर भालुओं को अप्रतिम दुर्धष सेनानी बनाने का रामवाण भी उसके पास था. सेतुबंध बांधने के लिए नल नील जैसे शिल्पी उसके पास थे, तो बज्रांग सुवेन्दु जैस कनक भूधराकार शरीर धारी योद्धा भी उसके पास थे.

जो संपोले कट मनी, तोलाबाजी और सिंडिकेट मनी तथा पशुधन तस्करी, जाली नोट व्यापार, नशीले पदार्थों की तस्करी और सबसे बढ़ कर जानसांख्यिकी परिवर्तन हेतु मानव आयात से विष संकलन कर रहे थे, उनका विषदंत तोड़ना परमावश्यक था. संपेरे ने परीक्षित जड़ी बूटियों का संधान कर गांव-गांव गली-गली में अपने केंद्रीय चेले चाटियों की फौज मुस्तैद कर दी. जो संपोले बिल में दुबक गए वह स्वयं तो बच निकले ही परंतु उनके विषदंश से लेकर सुरक्षित जनसमुदाय नागिन पर हल्ला बोलने को प्रस्तुत हो गया. कतिपय संपोले जो नंगा नाच करने पर उतारू थे उनकी बोराबंदी करने में संपेरे के चेला चाटियों ने तनिक भी विलम्ब नहीं किया.

अंततोगत्वा जब ‘खेला हो गेलोतब समझ में आया कि संपेरा कोई साधारण संपेरा नहीं था, जो एक नागिन को पकड़ने आया था अपितु वह तो जनमेजय था जो नाग यज्ञका संधान कर रहा था और दिग-दिगंत के नाग-नागिन उसके हवन कुंड के शाकल्य बन कर भस्मीभूत हो रहे थे. जन मानस विषमुक्त निर्मल समीर में श्वास संधान करने लगा है, परंतु एक ही चिंता है कि कोई तक्षक इन्द्रासन के पर्यंक के पाये से चिपक कर सुरक्षित न बच निकले!

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

रवींद्रनाथ पांडेय, सेवानिवृत सीमा शुल्क एवं उत्पाद अधीक्षक और समाजसेवी

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