ईरान ने अब इस अहम जल मार्ग को बंद करने की दी धमकी, भारत पर क्या होगा असर?

Amanat Ansari 01 Apr 2026 11:17: PM 3 Mins
ईरान ने अब इस अहम जल मार्ग को बंद करने की दी धमकी, भारत पर क्या होगा असर?

तेहरान: ईरान ने लाल सागर के एक महत्वपूर्ण जल मार्ग को बंद करने की धमकी दी है, जिससे वैश्विक व्यापार पर और ज्यादा दबाव पड़ने की आशंका बढ़ गई है. ईरान पहले ही होर्मुज को प्रभावी रूप से बंद कर चुका है, जिसकी वजह से फारस की खाड़ी में समुद्री यातायात लगभग ठप हो गया है.

अब ईरान अदन की खाड़ी और लाल सागर को जोड़ने वाले बाब अल मंदेब जलडमरूमध्य को भी बाधित करने की चेतावनी दे रहा है. यह मार्ग आगे स्वेज नहर तक जाता है. ईरान का कहना है कि अगर जमीन पर अमेरिकी सैनिकों की तैनाती होती है तो वह युद्ध में दूसरे मोर्चे खोल सकता है.

इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़ी तसनीम न्यूज एजेंसी ने एक ईरानी सैन्य सूत्र के हवाले से बताया कि बाब अल मंदेब दुनिया के रणनीतिक जलडमरूमध्यों में से एक है और ईरान के पास इसे खतरे में डालने की न सिर्फ इच्छा बल्कि पूरी क्षमता भी है.

ईरान ने यह भी कहा है कि अगर अमेरिका खार्ग द्वीप पर हमला करता है तो वह इस जल मार्ग को पूरी तरह रोक देगा. खार्ग द्वीप पर ईरान का एक बड़ा तेल निर्यात टर्मिनल है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वे ईरान का तेल लेना चाहते हैं और इस द्वीप पर कब्जा करने पर विचार कर रहे हैं.

बाब अल मंदेब जलडमरूमध्य कहां है और क्यों महत्वपूर्ण है?

यह जलडमरूमध्य लाल सागर के अरब पक्ष पर यमन और अफ्रीकी पक्ष पर जिबूती तथा इरिट्रिया के बीच स्थित है. हिंद महासागर और अदन की खाड़ी से आने वाले जहाजों को स्वेज नहर तक पहुंचने के लिए इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है. यह मार्ग 115 किलोमीटर लंबा और 36 किलोमीटर चौड़ा है. 1869 में स्वेज नहर के खुलने के बाद यह यूरोप और एशिया के बीच सबसे छोटा समुद्री रास्ता बन गया. दुनिया के कुल समुद्री यातायात का लगभग एक चौथाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है.

इस पर क्या असर पड़ेगा?

होर्मुज पहले से ही लगभग बंद है, जहां से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है. अगर बाब अल मंदेब भी बंद हुआ तो वैश्विक तेल आपूर्ति का अतिरिक्त 12 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित होगा. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार, मध्य पूर्व और एशिया से पश्चिमी देशों की ओर रोजाना करीब 50 लाख बैरल तेल इसी रास्ते से जाता है. दुनिया की कुल एलएनजी खेप का करीब 8 प्रतिशत इसी जलडमरूमध्य से गुजरता है.

कच्चे तेल और गैस के अलावा, हर दिन दर्जनों मालवाहक जहाज यहां से गुजरते हैं. अगर यह मार्ग बंद हुआ तो स्वेज नहर जैसी स्थिति बन सकती है, जैसी 2021 में एवर गिवेन जहाज फंसने से हुई थी. उस समय वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई थी, सामान की कीमतें बढ़ी थीं और डिलीवरी में देरी हुई थी.

विभिन्न देशों पर संभावित असर

  • यूरोप के देशों में तेल और एलएनजी की आपूर्ति में बड़ी कमी आ सकती है.
  • ऊर्जा कीमतें तेजी से बढ़ेंगी, जिससे बिजली, ईंधन और घरेलू खर्च महंगा हो जाएगा.
  • सामान्य माल की सप्लाई चेन बाधित होगी, जिससे महंगाई बढ़ेगी.
  • भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों को सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है.
  • तेल की कीमतें बढ़ने से पेट्रोल-डीजल महंगा होगा, जिसका असर ट्रांसपोर्ट, कृषि और उद्योग पर पड़ेगा.
  • निर्यात-आयात दोनों प्रभावित होंगे क्योंकि कई जहाजों को लंबा रास्ता लेना पड़ेगा, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ेंगे.
  • अमेरिका खुद मध्य पूर्व से कम तेल आयात करता है, लेकिन वैश्विक तेल कीमतों के बढ़ने से उसकी अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा.
  • अगर ट्रंप प्रशासन खार्ग द्वीप पर कब्जे या हमले की कोशिश करता है तो स्थिति और बिगड़ सकती है.

सऊदी अरब और खाड़ी देश

सऊदी अरब ने हाल में यनबू बंदरगाह से तेल निर्यात के लिए बाब अल मंदेब को ट्रांजिट पॉइंट बनाया है. अगर यह मार्ग बंद हुआ तो सऊदी तेल की आवाजाही प्रभावित होगी. हालांकि सऊदी अरब के पास पाइपलाइन विकल्प हैं, लेकिन अतिरिक्त लागत आएगी. स्वेज नहर से होने वाली आय बुरी तरह प्रभावित होगी क्योंकि जहाजों की संख्या घट जाएगी, जिसे मिस्र को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

भारत पर पड़ेगा गहरा असर

भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है. बाब अल मंदेब बंद होने से तेल की कीमतें बढ़ेंगी, रुपया कमजोर हो सकता है और महंगाई बढ़ने का खतरा रहेगा. निर्यात करने वाले जहाजों को भी लंबा चक्कर लगाना पड़ सकता है.

हूतियों की भूमिका क्या है?

इस जलडमरूमध्य पर हमला या ब्लॉकेज ज्यादातर ईरान समर्थित हूती विद्रोही कर सकते हैं, जो यमन के लाल सागर तट को नियंत्रित करते हैं. हूतियों ने पहले भी गाजा युद्ध के दौरान इस क्षेत्र में सैकड़ों हमले किए थे. वे कह रहे हैं कि ईरान के समर्थन में वे पूरी तरह तैयार हैं. विश्लेषकों का मानना है कि अगर ईरान-अमेरिका तनाव बढ़ा तो हूती फिर से लाल सागर में सक्रिय हो सकते हैं, जिससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार में नया संकट पैदा हो जाएगा.

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