मुस्लिम गढ़ कुंदरकी में इतिहास में पहली बार ऐसा कारनामा हुआ है.. जिसकी चर्चा सिर्फ लखनऊ में नहीं हो रही है, दिल्ली बीजेपी कार्यालय से लेकर महाराष्ट्र के RSS मुख्यालय तक हो रही है...ऐसा लग रहा था कि 90 के दशक की तरह इस दौर में में भी जाति का मुद्दा हावी होगा, और योगी आदित्यनाथ दिल्ली आने से पहले 2027 का चुनाव हारकर गोरखपुर लौट जाएंगे.
लेकिन ये सारे मिथक टूट गए हैं, क्योंकि जो नतीजे आए हैं, उनके अंदर झांककर देखने पर कई चौंका देने वाली बातें सामने आती है. मुरादाबाद की कुंदरकी सीट है बेशक यूपी में, लेकिन आप मानिए कश्मीर.. उस सीट का समीकरण आप ऐसे समझिए कि अब तक बीजेपी को हवा नहीं लगती थी.
लेकिन योगी ने अपने दम पर वो सीट जीतकर दिखा दिया. तो सवाल ये है कि योगी ने ऐसा किया क्या, और मुसलमानों ने अखिलेश को धोखा क्यों दिया. योगी के कारण अखिलेश और राहुल के बीच तनातनी हो गई है...मुसलमान आपस में बंट गया. चुनाव से पहले ही सपा उम्मीदवार का दावा था कि कुछ गद्दार मुसलमानों ने साथ छोड़ दिया.
जिसे सपा गद्दार बता रही थी, असल में उन्हें योगी पसंद थे. ये हाल सिर्फ कुंदरकी का नहीं है. सीसामऊ में इरफान सोलंकी की पत्नी नसीम सोलंकी भी हांफ रही हैं, वहां जिस हिसाब से बीजेपी ने वापसी की है. उससे साफ पता चलता है कि बंटेंगे तो कटेंगे नारे का मतलब हर एक हिंदू समझ रहा है.
मुजफ्फरनगर की मीरापुर सीट पर योगी आदित्यनाथ का डंका ऐसा बजा है कि वहां के नतीजे देखकर अखिलेश यादव की रातों की नींद उड़ जाएगी. बीजेपी ने RLD को वो सीट दी थी, जाटों और मुसलमानों को एक साथ लाने की जिम्मेदारी जयंत चौधरी पर थी.
और ये काम उन्होंने बखूबी कर दिखाया है. दरअसल मुजफ्फरनगर में मीरापुर है, और मुजफ्फरनगर से ही यूपी की सियासत में हिंदू-मुस्लिम की शुरुआत होती है. ये वही मुजफ्फरनगर है, जहां दंगा हुआ, तो समाजवादी पार्टी की सरकार भरभरा कर गिर गई. ये वही मुजफ्फरनगर है, जहां योगी ने नेमप्लेट और कांवड़ यात्रा के दौरान ATS उतारने का फैसला लिया तो हिंदुओं ने एक होकर ये बता दिया कि आवाज दो हम साथ हैं.
समाजवादी पार्टी को इस बात का सदमा लगा है कि न PDA साथ आया, न मुसलमान साथ आया
अखिलेश को इस बात की भी टेंशन है कि 2027 की कुर्सी भी फंस गई है, सत्ताधीश नहीं बन पाएंगे
ये योगी की जीत मानी जा रही है, क्योंकि योगी ने साफ कहा मां सीता की कितनी बार परीक्षा होगी
मुरादाबाद की कुंदरकी सीट पर भाजपा को सिर्फ एक बार 1993 में जीत मिली। 31 साल बाद भाजपा जीत की तलाश में है। यह सीट सपा के दिग्गज नेता शफीकुर्रहमान बर्क की कर्मभूमि रही। उनके पोते जियाउर रहमान बर्क यहां 2022 में 1.25 लाख के बड़े मार्जिन से चुनाव जीते। उनके सामने तब मोहम्मद रिजवान ने बसपा के टिकट से चुनाव लड़ा और हार गए। इस बार सपा ने उन्हें उतारा, क्योंकि रिजवान तीन बार यहां से चुनाव जीत चुके थे।
60% मुस्लिम बहुल वोटर वाली इस सीट पर भाजपा ने दो बार चुनाव हार चुके रामवीर पर फिर से भरोसा जताया। रामवीर लोगों के बीच गए। उनसे ढाई साल मांगे। जालीदार टोपी पहन मुस्लिम वोटर में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की। मुस्लिम कम्युनिटी में एक बार उन्हें भी मौका देने पर चर्चा हुई।