मुंबई: मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने एक डॉक्टर दंपत्ति के तलाक के मामले में सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की है. जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम.डी. सुमति की खंडपीठ ने कहा कि अगर समाज में ‘हाउसवाइफ’ (गृहणी) की भूमिका हो सकती है, तो ‘हाउस-हसबैंड’ की भूमिका भी उतनी ही स्वाभाविक हो सकती है. इसे नया नॉर्मल बनाया जाना चाहिए.
अदालत ने कहा, “हमारी संस्कृति में परिवार ही समाज की बुनियादी इकाई है. परिवार चलाने के लिए पैसा कमाने की जिम्मेदारी और घर के कामकाज संभालने की जिम्मेदारी, दोनों ही समान सम्मान और आदर की हकदार हैं.” कोर्ट ने जोर दिया कि ‘होममेकर’ शब्द किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है. अगर पुरुष भी घरेलू कामकाज और बच्चों की देखभाल में बराबर की जिम्मेदारी उठाएं, तो शादियां मजबूत होंगी और पारिवारिक ढांचा बचा रहेगा.
मामला तिरुवन्नामलाई के एक डॉक्टर दंपत्ति का था, जिनकी शादी 2011 में हुई थी. दोनों पुडुचेरी के मेडिकल कॉलेज में कार्यरत थे. बच्चों के जन्म और कोविड महामारी के बाद मतभेद बढ़ गए. पत्नी ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका दायर की, जबकि पति ने तलाक की अर्जी दी. थेनी फैमिली कोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दी थीं.
हाईकोर्ट की मध्यस्थता के बाद दोनों पक्ष आपसी सहमति से अलग होने पर राजी हो गए. पति ने पत्नी और बच्चों के कल्याण के लिए कुल 2.5 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई. इसमें से 1.5 करोड़ रुपये तीन महीने के अंदर पत्नी के खाते में जमा कराए जाएंगे और दोनों बच्चों के नाम पर 50-50 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट एक साल के अंदर की जाएगी. इन शर्तों के साथ अदालत ने तलाक की मंजूरी दे दी.