काठमांडू: नेपाल की राजनीति में दशकों पुरानी व्यवस्था और पारंपरिक राजनीतिक चेहरों को उखाड़ फेंकने का दावा करने वाले युवा प्रधानमंत्री बालेन्द्र (बालेन) शाह के कार्यकाल के 150 दिन पूरे हो चुके हैं।
सड़क की लोकप्रियता बनाम सत्ता की जटिलता
बालेन शाह ने नेपाल में 'डिलीवरी-बेस्ड गवर्नेंस' और 100-सूत्रीय सुधार एजेंडे का वादा कर सत्ता संभाली थी।
किन बड़े फैसलों और विवादों ने बढ़ाई मुश्किलें?
संसद और पार्टी से बढ़ती दूरी:
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह की संसद और अपनी ही पार्टी 'राष्ट्रिय स्वतंत्र पार्टी' (RSP) के नेताओं से दूरी बढ़ने लगी है।
सीमावर्ती व्यापार और कस्टम नियमों का झटका:
भारत से सटे सीमावर्ती इलाकों में दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर अचानक कड़े सीमा शुल्क और नियम लागू करने के फैसले से आम नागरिकों में भारी असंतोष फैल गया।
बस्ती हटाने और स्थानीय विवाद:
काठमांडू और आसपास के इलाकों में बिना उचित पुनर्वास के झुग्गी-झोपड़ियों और अनौपचारिक बस्तियों को हटाने की कोशिशों के बाद स्थानीय जनता और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
कूटनीतिक पेच और सुरक्षा चुनौतियां:
भारत और चीन के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाने में शुरुआती असमंजस और प्रोटोकॉल से जुड़े मुद्दों पर भी शाह सरकार की आलोचना हुई।
आगे का रास्ता: क्या संभलेगी स्थिति?
नेपाल के इतिहास में सबसे कम उम्र के राष्ट्राध्यक्ष बनकर उभरे बालेन शाह के लिए यह दौर सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा साबित हो रहा है।