नई दिल्ली: बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान का 23 अगस्त से शुरू होने वाला तीन दिवसीय भारत दौरा स्थगित हो गया है. इस दौरे के टलने के पीछे के कारण और उसके बाद के घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक रिश्ते किस मोड़ पर खड़े हैं. विदेश मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि ढाका के मौजूदा प्रशासनिक तंत्र की ओर से बिना किसी ठोस आधार के खतरों की आशंका जताना इस गतिरोध की मुख्य वजह है.
प्रस्तावित दौरे से ठीक पहले ढाका के शीर्ष अधिकारियों ने 7 अगस्त को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए रक्षा समझौते यानी तथाकथित ‘इस्लामिक नाटो’ में शामिल होने के संकेत दिए. साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मुकदमे का सामना करने के लिए भारत से प्रत्यर्पित करने की मांग भी उठाई गई.
भारत आने से पहले तारिक रहमान ने बीजिंग की यात्रा की थी. रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने चीन से तीस्ता जल-बंटवारा परियोजना के प्रबंधन का आग्रह किया और म्यांमार के रास्ते युन्नान-बांग्लादेश राजमार्ग का प्रस्ताव रखा. विश्लेषकों का मानना है कि यह कॉरिडोर व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि म्यांमार का संबंधित क्षेत्र अराकान और चिन विद्रोही सेनाओं के नियंत्रण में है.
बांग्लादेश की चुनौतियां केवल कूटनीति तक सीमित नहीं हैं. देश में जमात-ए-इस्लामी, हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी, जेएमबी और इस्लामी छात्र शिबिर जैसे संगठन प्रभाव बढ़ा रहे हैं. कॉक्स बाजार और चटगांव के इलाकों से पाकिस्तान समर्थित गुटों की गतिविधियां भी जारी हैं. भारत ने इस बीच पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने वाले रणनीतिक रूप से संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) की सुरक्षा को अत्यधिक मजबूत कर दिया है.
गृह मंत्री अमित शाह की ओर से घोषित त्रिकोणीय सुरक्षा ग्रिड के तहत किशनगंज, चोपड़ा और धुबरी में नए मिलिट्री स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश के लिए 1971 से चले आ रहे भारत के सहयोग और साझेदारी के प्रस्ताव पर सकारात्मक रूप से आगे बढ़ना ही दोनों देशों के हित में होगा.