टोक्यो: नवंबर 1942 में मुंबई से दक्षिण अफ्रीका की ओर रवाना हुआ एक यात्री-मालवाहक जहाज अपनी मंजिल तक कभी नहीं पहुंच सका. जापानी नौसेना की पनडुब्बी ने टॉरपीडो दागकर इसे हिंद महासागर में डुबो दिया. इस जहाज का नाम था एसएस तिलवा, जिसे बाद में ‘इंडियन टाइटैनिक’ के नाम से जाना जाने लगा. जहाज पर सैकड़ों यात्री और अरबों रुपए मूल्य का खजाना सवार था. डूबने के वक्त इसमें कुल 958 लोग सवार थे, जिनमें 732 यात्री शामिल थे.
जहाज में लगभग 6000 टन माल लदा हुआ था, जिसमें सबसे कीमती हिस्सा 60 टन चांदी की छड़ें थीं. इनकी उस समय की अनुमानित कीमत करीब 43 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी. 23 नवंबर 1942 को सेशेल्स से करीब 930 मील उत्तर-पूर्व में स्थित हिंद महासागर के गहरे पानी में जापानी पनडुब्बी के हमले से यह जहाज डूब गया. हादसे में 280 लोगों की जान चली गई, जबकि बाकी लोग जीवनरक्षक नावों से बचने में सफल रहे.
75 साल बाद खजाने की खोज
इस जहाज के साथ डूबे खजाने की तलाश कई दशकों तक चलती रही. आखिरकार 2017 में एक ब्रिटिश कंपनी ने गहरे समुद्र से इसकी चांदी बरामद कर ली. मलबा समुद्र तल से लगभग 4,500 मीटर नीचे स्थित था. कंपनी अर्जेंटम एक्सप्लोरेशन लिमिटेड ने 2014 में खोज अभियान शुरू किया था और तीन साल की मेहनत के बाद 2,364 चांदी की छड़ें निकालकर ब्रिटेन ले आई.
खजाना निकालने के बाद इस पर लंबा कानूनी विवाद खड़ा हो गया. कंपनी ने समुद्री कानून के तहत खुद को मालिक बताते हुए दावा किया और दक्षिण अफ्रीका से मुआवजे की मांग की. वहीं दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया. मामला ब्रिटेन की अदालतों में पहुंचा और अंत में 2024 में ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि 43 मिलियन डॉलर की यह चांदी दक्षिण अफ्रीका की संपत्ति है.
कोर्ट ने यह भी माना कि चांदी दक्षिण अफ्रीका की टकसाल में सिक्के बनाने के लिए भेजी जा रही थी, इसलिए इसका असली मालिकाना हक दक्षिण अफ्रीका के पास ही है. एसएस तिलवा कोई सैन्य जहाज नहीं था, बल्कि एक सामान्य यात्री और मालवाहक जहाज था.
ठीक उसी दिन जब यह डूबा (23 नवंबर 1942), द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कई अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं भी हुई थीं. आज भी समुद्री इतिहास और खजाने की खोज में रुचि रखने वाले लोग इस घटना को भारतीय टाइटैनिक कहकर याद करते हैं. करीब 82 साल बाद आखिरकार इस खजाने को उसका सही मालिक मिल गया है.