नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय के जज जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने महाराष्ट्र में सरकारी मराठी माध्यम स्कूलों के बंद होने पर गंभीर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ (नासिक कुंभ मेला) पर हुए भारी खर्च का अगर सिर्फ 0.1 प्रतिशत हिस्सा भी शिक्षा पर लगाया जाता तो राज्य के करीब 100 से 125 स्कूल बंद नहीं होते.
जस्टिस वराले धुले जिले के एक हाई स्कूल में ‘स्मार्ट क्लास’ के उद्घाटन कार्यक्रम में बोल रहे थे, जहां वे खुद कुछ साल छात्र रह चुके हैं. उन्होंने बताया कि सरकार विभिन्न पहलों के लिए भारी फंड देने का दावा करती है. उप मुख्यमंत्री ने कुंभ मेले के लिए 32,000 करोड़ रुपए और मुख्यमंत्री ने 34,000 करोड़ रुपए का जिक्र किया. एक कॉरिडोर प्रोजेक्ट के लिए 11,000 करोड़ रुपए दिए जाने की भी खबर है.
जस्टिस वराले ने कहा, “मुझे सरकार द्वारा विभिन्न विकास पहलों पर हजारों करोड़ रुपए खर्च करने पर कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन अगर इन हजारों करोड़ में से सिर्फ 0.1% यानी लगभग 32 करोड़ रुपए भी शिक्षा पर खर्च किए जाते तो राज्य भर में 100 से 125 मराठी माध्यम स्कूल बंद नहीं होते.”
क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा का महत्व
जस्टिस वराले ने क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने स्थानीय नगरपालिका और जिला परिषद के मराठी माध्यम स्कूलों में 10वीं कक्षा तक पढ़ाई करने का अपना अनुभव साझा किया. उन्होंने कहा कि मराठी में पढ़ाई से उनके करियर में कभी कोई रुकावट नहीं आई, बल्कि नज़रिया और बेहतर हुआ. संत ज्ञानेश्वर और कवि सुरेश भट का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “मराठी भाषा में सीखने से मुझे दूसरों के प्रति व्यापक और खुले विचारों वाला नजरिया मिला. मेरी भाषा ने मुझे भाईचारे की सीख दी.”
शिक्षा बजट में कमी पर चिंता
जस्टिस वराले ने पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा बजट आवंटन में आई कमी की भी आलोचना की. उन्होंने कहा कि केंद्र स्तर पर शिक्षा का बजट कभी 8%, 12% और 11% के बीच हुआ करता था. छात्रों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह बढ़ना चाहिए था, लेकिन कई सालों से यह 13% तक भी नहीं पहुंच पाया है. उन्होंने ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की खराब हालत पर भी जोर दिया.